इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (जीडीए) नए कानून के तहत मुआवजा दे अन्यथा भूमि अधिग्रहण रद्द हो जाएगा। यह आदेश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की खंडपीठ ने भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली हतम सिंह की ओर से दाखिल याचिका व अन्य 32 याचिकाओं पर दिया है। गाजियाबाद के मोहिउद्दीनपुर कनवानी गांव में लगभग 367 बीघा भूमि का जीडीए ने आवासीय काॅलोनी विकसित करने के लिए अधिग्रहण किया था। याचियों ने अधिग्रहण में नियमों का पालन न करने का आरोप लगाते हुए हाईकोर्ट में अधिग्रहण रद्द करने के लिए याचिका दाखिल की। याचिकाकर्ताओं ने मुख्य रूप से दो अधिग्रहण अधिसूचनाओं 16 अक्तूबर 2004 और 28 नवंबर 2005 को जारी नोटिस की वैधता पर सवाल उठाया था। उनका तर्क था कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 की धारा 17 (आपातकाल खंड) को लागू करके लोगों की आपत्तियां नहीं सुनी गई। ऐसे में यह अधिग्रहण अवैध है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद पाया कि आपातकाल प्रावधानों को लागू करना मनमाना और अवैध था। इसके बाद भी कोर्ट ने जीडीए को सशर्त राहत प्रदान की। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि जीडीए आदेश की तारीख से आठ सप्ताह के भीतर याचियों को भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के प्रावधानों के तहत मुआवजा देता है तो अधिग्रहण बना रहेगा। यदि जीडीए नए नियम के तहत मुआवजा नहीं देता है तो अधिग्रहण रद्द माना जाएगा और वह भूमि संबंधित भूस्वामियों को सभी भारों से मुक्त होकर वापस मिल जाएगी। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश का लाभ केवल उन्हीं भूस्वामियों को मिलेगा जो न्यायालय के समक्ष याचिकाकर्ता थे। यह लाभ उन लोगों पर लागू नहीं होगा जिन्होंने पहले ही मुआवजा स्वीकार कर लिया है और अपनी भूमि हस्तांतरित कर दी थी।