संतों और श्रद्धालुओं के केश और शिखाओं की भी अलग परंपरा है। कोई बड़ी शिखा रहता है, कोई लंबे बाल रखता है, तो किसी के सिर पर कभी बाल दिखते ही नहीं। संतों में शिखा को लेकर कई किदवंतियां० भी प्रचलित हैं। शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती का कहना है कि शिखा का आकार गाय के खुर जितना होना चाहिए। चाणक्य अपनी शिखा के लिए जाना जाता है। शिखा को ऊर्जा का स्रोत माना जाता है।