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कुंभ 2019: संतों की शिखा है शरीर का पावर हाउस, शास्त्रों में है चोटी रखने की परंपरा

Sat, 19 Jan 2019 04:43 PM IST
shubham न्यूज डेस्क,अमर उजाला, प्रयागराज
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साधु संत
संतों और श्रद्धालुओं के केश और शिखाओं की भी अलग परंपरा है। कोई बड़ी शिखा रहता है, कोई लंबे बाल रखता है, तो किसी के सिर पर कभी बाल दिखते ही नहीं। संतों में शिखा को लेकर कई किदवंतियां० भी प्रचलित हैं। शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती का कहना है कि शिखा का आकार गाय के खुर जितना होना चाहिए। चाणक्य अपनी शिखा के लिए जाना जाता है। शिखा को ऊर्जा का स्रोत माना जाता है।







 
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Daniel Baba - फोटो : Social Media
उनका कहना है कि शिखा शरीर के वाह्यरंध्र का केंद्र बिदु होती है शिखा। सामान्य ब्राह्मणों में भी शिखा रखने की परंपरा है। मध्य प्रदेश से कल्पवास करने आए शिवकुमार मिश्र ने बताया कि शिखा संस्कार उनके परिवार का हिस्सा रहा है। उन्होंने अपने बच्चों का शिखा संस्कार कराया है। देवरिया से आए दीनानाथ पांडेय ने बताया कि उनकी तरफ शिखा को चोटी कहा जाता है। 
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कंप्यूटर बाबा - फोटो : SELF
देवरहा बाबा सेवाश्रम के संचालक डाक्टर रामेश्वर प्रपन्नाचार्य शास्त्री ने बताया कि हिंदू धर्म में शिखा का विशेष महत्व है। ब्राह्मणत्व की पहचान जनेऊ और शिखा से होती है। इसी तरह संतों की पहचान उनके केश से पता चलती है। ज्यादातर संत परंपरा में लंबे केश का विधान है। 
 

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Naga sadhu and Aghori
वाराणसी के भदोही से आए श्रद्धालु गया प्रसाद शुक्ल ने बताया कि जब भी किसी के निधन पर केश बनाने का संस्कार होता है तो उसमें चोटी को फिर भी रखा जाता है। उसे किसी भी सूरत में काटने का विधान नहीं है।
 
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Female Naga Sadhu - फोटो : Social Media
कई संत परंपरा में शिखा जरूरी
रामनुजाचार्य और रामानंदाचार्य परंपरा में शिखा का विशेष महत्व है। सिर के आगे का हिस्सा पूरी तरह से साफ रहता है, उसके बाद का हिस्सा शिखा के रूप में रहता है। इसी तरह कई ऐसे संत हैं, जो लंबे बाल की वजह से जाने जाते हैं, बाबा रामदेव, श्रीश्री रविशंकर के अलावा योगदा से जुड़े संतों में भी बड़े केश रखने की परंपरा है।
 
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