भारत सरकार के साइंस एंड इंजीनियरिंग रिसर्च बोर्ड की ओर से एमएनएनआईटी को यह प्रोजेक्ट दो वर्ष के लिए दिया गया है। इसके लिए 30 लाख रुपये का अनुदान भी दिया गया है। प्रोजेक्ट पर काम कर रहीं संस्थान के बॉयोटेक्नोेलॉजी विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रूपिका सिन्हा कहती हैं, एंटीबॉयोटिक का निर्माण दो तरीके से होता है।
मोती लाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान के जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने नई तकनीक की मदद से बैक्टीरिया में एंटीबॉयोटिक उत्पन्न करने की क्षमता वृद्धि पर काम की पहल की है। ताकि कम से कम बैक्टीरिया से अधिक से अधिक एंटीबॉयोटिक का निर्माण हो सके। अधिक एंटीबॉयोटिक के उत्पादन से कीमत में कमी आएगी।
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भारत सरकार के साइंस एंड इंजीनियरिंग रिसर्च बोर्ड की ओर से एमएनएनआईटी को यह प्रोजेक्ट दो वर्ष के लिए दिया गया है। इसके लिए 30 लाख रुपये का अनुदान भी दिया गया है। प्रोजेक्ट पर काम कर रहीं संस्थान के बॉयोटेक्नोेलॉजी विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रूपिका सिन्हा कहती हैं, एंटीबॉयोटिक का निर्माण दो तरीके से होता है।
एक केमिकल जबकि दूसरा बैक्टीरिया से उत्पन्न एंटीबॉयोटिक के माध्यम से। ‘को कल्चर’ तकनीक के माध्यम से देखा जाएगा कि किस वातारण और माहौल में बैक्टीरिया अधिक से अधिक एंटीबॉयोटिक का निर्माण करते हैं। यह प्रक्रिया पूरी तरह से प्राकृतिक होगी। इससे पर्यावरण पर कोई दुष्प्रभाव नहीं होगा।
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साथ ही पूरी तरह से प्राकृतिक माध्यम से यह एंटीबॉयोटिक बनाने का प्रयास किया जाएगा। प्रयोगशाला में 50 एमएल बैक्टीरिया पर प्रयोग में सफलता के बाद 30 लीटर बैक्टीरिया पर प्रयोग किया जाएगा। फिर तकनीक का पेटेंट कराया जाएगा।
टीबी के इलाज में यह एंटीबॉयोटिक कारगर
डॉ.रू पिका सिन्हा ने बताया कि हर बीमारी के लिए अलग-अलग तरह की एंटीबॉयोटिक का प्रयोग होता है। यह एंटीबॉयोटिक टीबी की बीमारी से ग्रसित मरीजों के इलाज में कारगार होगी। डॉ.रूपिका के साथ प्रोजेक्ट पर जेआरएफ छात्रा भावना टंडन भी काम कर रही है। जनवरी 2022 में मिले प्रोजेक्ट को दो वर्ष में पूरा करना है।