इसमें कहा गया था कि उच्चतम न्यायालय ने 25 जुलाई 2017 व बाद में इस मामले में अभ्यर्थियों की ओर से दाखिल अवमानना केस में 13 दिसंबर 2019 को सरकार द्वारा प्रशिक्षु शिक्षकों की सम्पन्न की गई भर्ती को सही मानते हुए अवमानना का वाद खत्म कर दिया था। ऐसे में 2011 की भर्ती को लेकर फिर से शेष बचे अभ्यर्थियों की काउंसलिंग कराने का एकल जज की ओर से निर्देश दिया जाना गैर कानूनी है। वहीं, अभ्यर्थी विनय पांडेय व अन्य की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक खरे एचएन सिंह आरके ओझा अनिल तिवारी का कहना था कि एकल न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश में कोई त्रुटि नहीं है।
अभ्यर्थियों को कोर्ट से लगा झटका
हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने बेसिक शिक्षा परिषद में 72825 सहायक अध्यापकों की नियुक्ति के मामले में निर्देश दिया था कि इसमें बचे 12091 पदों पर काउंसलिंग कराने के लिए विज्ञापन जारी किया जाए। उसका परिणाम फरवरी के अंतिम सप्ताह तक जारी कर दिया जाए। न्यायालय के इस आदेश से 12 वर्षों से चले आ रहे इस भर्ती विवाद का पटाक्षेप होने की उम्मीद थी।
याची के अधिवक्ताओं का कहना था कि 72825 सहायक अध्यापकों की भर्ती में से न्यायालय के आदेश के परिणाम स्वरूप 66655 पदों पर चयन हो गया है और चयनित अभ्यर्थियों ने कार्यभार भी ग्रहण कर लिया है, लेकिन 12091 पद अब भी शेष रह गए हैं। जिन पर काउंसलिंग नहीं कराई गई और चयन की सीमा में आने वाले अभ्यर्थियों की नियुक्ति नहीं हो सकी है।
एकल न्यायाधीश ने कहा था कि यह आश्चर्यजनक है कि जानकारी होने के बावजूद चयनित अभ्यर्थी काउंसलिंग में न शामिल होकर मुकदमे में लगे रहे। काउंसलिंग से संबंधित कोई तथ्य रिकॉर्ड पर नहीं है। ऐसी स्थिति में राज्य सरकार और बेसिक शिक्षा परिषद 12091 पदों पर नए सिरे से काउंसलिंग के लिए विज्ञापन जारी करे और इस श्रेणी में आने वाले उन अभ्यर्थियों को बुलाया जाए, जो पूर्व में शामिल नहीं हुए।