इस पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से कहा गया कि नाम से पहले शंकराचार्य लिखने पर सुप्रीम कोर्ट से कोई रोक नहीं है और प्रशासन जिस आदेश का हवाला दे रहा है, उससे पहले उनका पट्टाभिषेक हो चुका था। शंकराचार्य की तरफ से सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता पीएन मिश्र ने उनका पक्ष रखते हुए बताया कि कोर्ट में प्रार्थना पत्र दिया गया था कि अब ब्रह्मलीन हो चुके स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के स्थान पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती शंकराचार्य होंगे।
शंकराचार्य के अधिवक्ता पीएन मिश्रा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कहीं नहीं लिखा है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद स्वयं को शंकराचार्य नहीं लिख सकते या शंकराचार्य के रूप में अपने आप को प्रचारित-प्रसारित नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में ही उनको शंकराचार्य कहा है। मेला प्रशासन ने जो नोटिस दिया है, वह सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक कार्रवाई में दखलअंदाजी है। इसके लिए अधिकारियों पर अवमानना की कार्रवाई की जा सकती है।
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से दिए गए तर्क
शंकराचार्य वह है, जिसे बाकी अन्य तीन पीठों के शंकराचार्य मान्यता देते हैं। दो पीठों द्वारका पीठ और शृंगेरी पीठ के शंकराचार्य उन्हें शंकराचार्य कहते हैं।
पुरी के शंकराचार्य ने उनके बारे में कुछ नहीं कहा है। उन्होंने न तो यह कहा कि वह शंकराचार्य नहीं हैं और न ही यह कहा कि शंकराचार्य हैं। जब शृंगेरी और द्वारका के शंकराचार्य यह कह रहे हैं कि हम शंकराचार्य हैं तो आखिर किस प्रमाण की आवश्यकता है कि हम शंकराचार्य हैं या नहीं? खुद सरकार ने महाकुंभ में एक पत्रिका छापी थी, उसमें उन्हें शंकराचार्य बताया था। क्या मुख्यमंत्री या राष्ट्रपति तय करेंगे कि शंकराचार्य कौन है? यह अधिकार सिर्फ शंकराचार्यों के पास है कि शंकराचार्य कौन होगा
नोटिस देने गए कानूनगो को पहली बार लौटाया
मेला प्रशासन ने सोमवार देर रात को ही नोटिस जारी कर दिया था। नोटिस पर 19 जनवरी 2026 की तिथि अंकित है। सोमवार रात 12 बजे कानूनगो शंकराचार्य के शिविर में नोटिस देने पहुंचे। कानूनगो ने शंकराचार्य के शिष्यों से नोटिस लेने के लिए कहा लेकिन शिष्यों ने नोटिस लेने से मना कर दिया। मंगलवार सुबह कानूनगो ने दोबारा जाकर शिविर के बाहर नोटिस चस्पा कर दिया।