स्वामी अभेद आनंद, चिन्मय मिशन।
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चिन्मय मिशन नवीन सेवाश्रम में तीन से नौ नवंबर तक चल रहे ज्ञान के अंतिम चरण में आज की प्रातः कालीन कक्षा में पूज्य स्वामी अभेद आनंद जी ने बताया कि उपनिषद सत्य को अपने मन बुद्धि व अतः करण में उद्धारित करने करने के लिए जगत की सत्ता अतार्किक है, सत्य है, ऐसी बुद्धि को ग्रहण करना होगा। यह भ्रम जो हमारा स्वरूप है, वह जन्म, मृत्यु, शरीर, मन, कर्ता, भोक्ता इन सबसे से परे है। यह संपूर्ण जगत यहां तक की यह शरीर मन बुद्धि इस आत्म तत्व पर अध्यासित है।
वर्तमान भूत व भविष्य तथा जगत स्वप्न व सुसुष्टि में निरंतर 'हैं' अथवा 'अस्मि' की भावना हो सतत विद्यमान है। अन्य सब कुछ परिवर्तनशील है। इस आत्म तत्व में स्थित हो उपनिषदों का अंतिम व शाश्वत उद्घोष है। यही हमारा प्राप्तव्ययी होना चाहिए। स्वयं कालीन कक्षा में श्री भरत जी के चरित्र जो स्वयं में गुणों की खान हैं। निश्छल प्रेम, भक्ति ,समर्पण न्याय की साक्षात प्रतिमूर्ति है। उनके दिव्या आचरण का बखान करते हुए पुण्य स्वामी जी ने बताया कि गुरु वशिष्ठ जी उन्हें संबोधित करते हुए कहते हैं कि भारत तुम तो गुणों की खान हो, तुम्हें दोस्त स्पर्श भी नहीं कर सकते श्री राम के हृदय में तुम्हारे प्रति अगाध स्नेह है, अपने मन से हर प्रकार की शंका को त्याग दो, किंतु भारत जी के नेत्र झुके हुए ही रहते हैं।
भैया राम से मिलने को आतुर भारत जीवन गमन की यात्रा में सबका यथोचित ध्यान रखते हुए आगे बढ़ रहे हैं। प्रतिपल उनके नेत्र श्री राम के दर्शन करने को अधी है क्या देख अयोध्यावासी भी विहवल है उनका मन बार-बार यही कहता है भाई हो भारत मैया जैसा।