धर्म, जाति और भाषा को आधार बनाकर राजनीति करना अब दुश्वार होगा। देश का संविधान इसकी इजाजत नहीं देता है। सुप्रीमकोर्ट की सात जजों की पीठ के फैसले को संविधान और कानून के जानकार इसी नजर से देखते हैं। माना जा रहा है कि सर्वोच्च अदालत का फैसला ऐतिहासिक है और इसके दूरगामी परिणाम होंगे। यह देश की राजनीति की दिशा बदलने वाला फैसला साबित हो सकता है।
संविधान विशेषज्ञ वरिष्ठ अधिवक्ता एएन त्रिपाठी का कहना है कि फैसला देश की सेक्युलर डेमोक्रेसी के पक्ष में है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में 42वें संशोधन के द्वारा एक जनवरी 1972 को सेक्युलर शब्द जोड़ा गया। इसके व्यापक मायने हैं। यह लोकतंत्र के मौलिक ढांचे में शामिल है, मगर अब तक इस ‘सेक्युलर’ शब्द की अदालत द्वारा व्याख्या नहीं होने के कारण तमाम राजनीतिक पार्टियां फायदा उठा रहीं थीं। सुप्रीमकोर्ट ने इस कमी को दूर करते हुए ऐतिहासिक निर्णय दिया है।
इस निर्णय से निर्वाचन आयोग को धर्म, जाति और भाषा के नाम पर राजनीतिक दल बनाने या इनके नाम पर वोट मांगने वालों पर नकेल कसने की ताकत मिलेगी। त्रिपाठी बताते हैं कि संविधान के अनुच्छेद 30 में अल्पसंख्यक वर्ग को शैक्षिक संस्था स्थापित करने की छूट है, मगर अल्पसंख्यक होने के आधार पर राजनीतिक दल बनाने या वोट मांगने का संविधान अधिकार नहीं देता है। इसी प्रकार का प्रावधान जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123(3) और (3ए) में भी दिया हुआ है।
वरिष्ठ अधिवक्ता और बार कौंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन वीसी मिश्र का कहना है कि संविधान धर्म मानने की आजादी देता है, मगर वोट के लिए इसका इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देता है। सुप्रीमकोर्ट का निर्णय संविधान सम्मत है। जाति प्रथा हमारे समाज के विकास में बाधक है। इसका राजनीति में प्रयोग बंद होना चाहिए।