सेतु भारतम् परियोजना कार्यक्रम में प्रधानमंत्री
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देश की सियासत का केंद्र बन चुके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मैजिक इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि) की छात्र राजनीति में नहीं चला। दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) और जेएनयू में भाजपा विरोधी खेमे की जीत के बाद इविवि में भी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को झटका लगा है। पांच प्रमुख पदों में से अध्यक्ष समेत चार पर परिषद के प्रत्याशी को हार मिली है। मात्र महामंत्री पद पर एबीवीपी के उम्मीदवार निर्भर द्विवेदी विजयी हुए। अन्य सभी पद पर समाजवादी छात्रसभा ने परचम लहराया है। छात्रों की संख्या के लिहाज से सीएमपी डिग्री कालेज में भी एबीवीपी को झटका लगा है। परिषद की इस हार को भाजपा की युवाओं के बीच पकड़ कमजोर होने के रूप में देखा जा रहा है। परिषद के प्रति युवाओं के इस रुख ने आने वाले चुनाव में राजनैतिक दलों, खास तौर पर भाजपा को सोचने के लिए मजबूर कर दिया है।
समाजवादी छात्रसभा पैनल के प्रत्याशियों की जीत से सपा के साथ कांग्रेस कार्यकर्ता भी उत्साहित हैं। दोनों दल इसे परिवर्तन के रूप में देख रहे हैं। एबीवीपी से छात्र-छात्राओं की दूरी से आगामी नगर निगम चुनाव और फूलुपर लोकसभा उपचुनाव में समीकरण बदलने के आसार नजर आ रहे हैं। हालांकि, एबीवीपी की हार के पीछे कई कारण कारण बताए जा रहे हैं। कहीं चर्चा है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार की शिक्षा नीतियों पर उठ रहे सवालों ने छात्रसंघ चुनाव परिणाम को प्रभावित किया है तो कहीं एबीवीपी में आपसी घमासान को भी इसकी वजह माना जा रहा है। चुनाव से पहले एबीवीपी से अध्यक्ष पद के लिए तीन प्रमुख दावेदार थे, जिनमें प्रियंका सिंह के साथ मृत्युंजय राव परमार और सूरज कुमार दुबे का नाम शामिल था, लेकिन एबीवीपी ने प्रियंका को प्रत्याशी बनाया। ऐसे में इविवि में सक्रिय एबीवीपी का बड़ा धड़ा मृत्युंजय राव परमार के साथ चला गया। इसके अलावा मृत्युंजय राव परमार के पिता गुरु प्रकाश राव और मां मंजू राव सीधे संघ से जुड़े हैं। इस वजह से भी संघ और भाजपा के कई नेताओं ने मृत्युंजय को भी अपना समर्थन दिया। इसका नतीजा रहा कि प्रियंका को परमार से कम मत मिले और वह तीसरे स्थान पर रहीं।
एबीवीपी की हार के पीछे एक वजह यह भी बताई जा रही है कि छात्र आंदोलन के दौरान विश्वविद्यालय प्रशासन ने लगातार एबीवीपी के कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई की। एबीवीपी के चार छात्रों को विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिया गया। इसके खिलाफ एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय तक गुहार लगाई, लेकिन मंत्रालय ने मामले में किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं किया। जबकि एबीवीपी के कार्यकर्ता इविवि में छात्र हित में ही आंदोलन कर रहे थे। इन तमाम मामलों के सामने आने के बाद अन्य छात्रों को लगा कि जब एबीवीपी के छात्रों की ही सरकार में सुनवाई नहीं हो रही है तो आम छात्रों की कौन सुनेगा और ऐसे में छात्रों ने दूसरे प्रत्याशियों पर भरोसा जताया।