रविनंदन सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार।
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साजिश के तहत कराया गया था फोन
दूधनाथजी ने एकेडेमी में एक बैठकी के दौरान मुझे बताया था कि उनकी पहली कहानी की चर्चा के लिए मंच पर भैरवप्रसाद गुप्त, मार्कंडेय, नरेश मेहता, रघुवंश, अमृतराय जैसे दिग्गज विराजमान थे। उस दिन सरेआम उनकी धज्जियां उड़ाई गईं। सलाह मिली, कहानी लिखना छोड़ें, कविताएं ही लिखें। उस दिन कहानीकार बनने का नशा चूर हो चुका था। कई दिनों तक बेचैन रहे। फिर चुनौती स्वीकार कर ली। जिद ओढ़ ली और साठोत्तरी पीढ़ी के सर्वश्रेष्ठ कथाकारों में शामिल हुए। कहते थे, आजकल लोग आलोचनाओं का बुरा मान जाते हैं, जबकि यह लेखक की मंजाई का काम करती है।
अपने गुरु डॉ धीरेंद्र वर्मा की ग्रंथावली पर काम करते वक्त दूधनाथजी हिंदुस्तानी एकेडेमी अक्सर आते थे। यहीं एक रोज किसी का फोन आया तो दूधनाथजी डांटने के अंदाज में बोले, ''''मैं किसी पुरस्कार के लिए अपनी संस्तुति नहीं कराऊंगा, क्यों कराऊं, मुझे नहीं चाहिए पुरस्कार।'''' फिर पूछने पर बोले, ''''कह रहा था कि हिंदी संस्थान के महात्मा गांधी सम्मान के लिए किसी से संस्तुति करा दीजिए।'''' उसी साल उन्हें संस्थान का भारत भारती सम्मान मिला। संस्तुति करा देते तो यह सम्मान उन्हें नहीं मिलता। वह फोन इसी साजिश का हिस्सा था। - रविनंदन सिंह- (लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं।)