इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम-2021 को राष्ट्रपति की मंजूरी के अभाव में असांविधानिक कर दिया है। यह फैसला न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह, न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने इंद्रभूषण सावनी बनाम कंचन कुमारी जैन व अन्य समेत जुड़े मामलों में सुनाया है।
कोर्ट के इस फैसले का सीधा असर मकान मालिकों और किरायेदारों के बीच किराया बढ़ाने, किराया तय करने और बेदखली से जुड़े विवादों पर पड़ेगा। अब मनमाने किराये पर लगेगी लगाम पर कानूनी लड़ाई लंबी होगी। याचियों ने अधिनियम 2021 की धारा 8, 9, 10 और 38 की सांविधानिकता को चुनौती दी थी।
धारा-9 और 10 के तहत किराया तय या संशोधित करने की जो व्यवस्था थी, वह अब लागू नहीं रहेगी। इसलिए अधिनियम-2021 के कानून के तहत मकान मालिक किराया बढ़ा या संशोधित नहीं कर सकेंगे। ब्यूरो
कोर्ट ने माना कि यह कानून संविधान की समवर्ती सूची के अंतर्गत आता है। केंद्रीय कानून, संपत्ति अंतरण अधिनियम-1882 और प्रांतीय लघु वाद न्यायालय अधिनियम-1887 के प्रावधानों के विपरीत है। इसके बावजूद इस कानून के लिए अनुच्छेद 254(2) के तहत राष्ट्रपति की पूर्व सहमति नहीं ली गई थी।
कोर्ट ने धारा 8, 9, 10 और 38 को बताया असांविधानिक
कोर्ट ने अधिनियम की धारा-8 (देय किराया), धारा-9 (किराया संशोधन), धारा-10 (विवाद की स्थिति में किराया प्राधिकरण की ओर से किराया निर्धारण), धारा-38 और धारा-42 (अधिनियम का अन्य कानूनों पर प्रभावी होना) को असांविधानिक घोषित किया है। कोर्ट ने रेंट अथॉरिटी की ओर से धारा-10 के तहत किराया बढ़ाने और बेदखली से संबंधित जारी आदेशों को भी रद्द कर दिया है। साथ ही स्पष्ट किया कि आदेश की तिथि तक जिन मामलों में कोई कानूनी चुनौती नहीं दी गई थी और जो प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी हैं, वे सुरक्षित रहेंगी।
किरायेदार पर प्रभाव-मामलों की सुनवाई अब विशेष अथॉरिटी की जगह पुराने सिविल कोर्ट में होगी, जिससे मनमाने तरीके से किराया बढ़ाने या तुरंत बेदखल करने पर रोक लगेगी।
मकान मालिक पर असर-किरायेदारी के पुराने मामलों और संपत्ति पर नियंत्रण के लिए सिविल अदालतों के स्थापित अधिकार फिर से प्रभावी हो गए हैं।