आगे जानेंगे स्राव की मात्रा और असर
शोध के अगले चरण में सेंसर को अपग्रेड किया जाना है। प्रो. यादव अब सेंसर को अपग्रेड करके डोपामिन के स्राव की सटीक मात्रा और उससे मानव मस्तिष्क पर होने वाले सकारात्मक व नकारात्मक असर का पता लगाएंगे। यह भी पता लगाएंगे कि डोपामिन सेंसर कितने दिनों तक काम कर सकता है। यह शोध चिकित्सा क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाला साबित हो सकता है।
इविवि में डिजाइन हुआ, आईआईटी में प्रैक्टिकल, ब्राजील में थ्योरी पर काम
सेंसर तैयार करने में टाइटेनियम, जरकोनियम और निकिल के एलॉय कम्पोजिशन का उपयोग किया गया है। इसकी डिजाइन इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रो. यादव ने तैयार की और प्रारंभिक स्तर पर यहीं प्रयोग भी किए। सफलता मिलने पर आईआईटी खड़गपुर में इसे प्रायोगिक तौर पर परखकर अंतिम रूप दिया गया। सेंसर की थ्योरी (सिद्धांत) पर पूरा काम ब्राजील की सैंपियाना यूनिवर्सिटी में हुआ।
डोप टेस्ट भी सेंसर से हो सकेगा संभव
खिलाड़ियों के डोप टेस्ट में खून का नमूना लेकर डोपामिन ही परखा जाता है। किसी शक्तिवर्धक दवा के लेने पर यह डोपामिन अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाता है, जो कि टेस्ट में पकड़ा जाता है। मौजूदा शोध आगे बढ़ने पर डोप टेस्ट भी खून के बजाय सेंसर से ही करना संभव हो सकेगा।
हार्ट फेल होने पर देते हैं डोपामिन
मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज में मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. सुजीत वर्मा बताते हैं कि डोपामिन एक न्यूरो ट्रांसमीटर है, जो दिमाग के जरिये भावनाओं को नियंत्रित करता है, आनंद का अनुभव कराता है और शरीर की गति को भी नियंत्रित करता है। शरीर में इसका सामान्य स्तर 0 से 30 पिकोग्राम प्रति मिलीलीटर होता है। इसके घटने-बढ़ने के दुष्परिणाम भी देखने को मिलते हैं। कार्डियोजेनिक शॉक, सेप्टिक शॉक या हार्ट फेल हो जाने पर डोपामिन इंजेक्शन देते हैं, ताकि रक्तचाप और हृदय की कार्यक्षमता बढ़ाई जा सके। अभी इसकी जांच खून के नमूने से ही हो पाती है।