चेन्नई की आभूषण कंपनी ने किया है निर्मित
इस राजदंड को बनाने का दावा चेन्नई की आभूषण निर्माता कंपनी वीबीजे (वूम्मीदी बंगारू ज्वैलर्स) संग्रहालय प्रशासन के समक्ष कर चुकी है। कंपनी का दावा है कि 1947 में उसके वंशजों ने ही इस राजदंड को अंतिम वायसराय के आग्रह पर बनाया था।
इस कंपनी के मार्केटिंग हेड अरुण कुमार तत्कालीन संग्रहालय निदेशक डॉ. सुनील गुप्ता से संपर्क कर इस राजदंड के निर्माण से संबंधित दस्तावेज भी प्रस्तुत कर चुके हैं। 1947 के बाद संग्रहालय के क्यूरेटर रहे एससी काला ने इस राजदंड को प्राप्त किया था। उस दौर में पं. नेहरू की कई निशानियों को आनंद भवन से संग्रहालय में संरक्षित करवाया गया था।यह राजदंड भी उन्हीं में से एक संग्रह के रूप में सोने की छड़ी के तौर पर लाया गया था। आजादी के अमृत महोत्सव के दौरान कंपनी के वंशजों ने संग्रहालय का दौरा कर राजदंड पर नए सिरे से अपना ब्लॉक लगवाने का आग्रह किया था।
सत्ता हस्तांतरण का प्रतीक है गोल्डन स्टिक
अमर उजाला ने 23 मार्च 2021 को प्रमुखता से प्रकाशित खबर में पहली बार इस गोल्डेन स्टिक की पहचान सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक राजदंड के रूप में की थी। इसके बाद संस्कृति मंत्रालय की ओर से कराई गई पड़ताल में यह बात सच साबित हुई। इसके बाद संस्कृति मंत्रालय के आग्रह पर राजभवन की बैठक में इस राजदंड को राष्ट्रीय संग्रहालय दिल्ली को प्रदान करने का निर्णय लिया गया। छह महीने पूर्व संस्कृति मंत्रालय की टीम यहां से इस राजदंड को दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय ले जा चुकी है।
सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के तौर पर पहचान होने के बाद इलाहाबाद संग्रहालय से राजदंड को राष्ट्रीय संग्रहालय में रखवाया गया था। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इच्छा पर इसे संसद भवन में सुशोभित कराया जाएगा। संस्कृति मंत्रालय की ओर से बृहस्पतिवार को इसका पॉवर प्रजेंटेशन दिया जाएगा। - सौरभ भाइक, सलाहकार-संस्कृति मंत्रालय।