याची के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि 2016 में भी इन्हीं आरोपों पर हुई विभागीय जांच में कर्मचारी निर्दोष पाया गया था। जिसके बाद हुई दूसरी जांच में याची की सेवा समाप्त कर दी गई हैं। उन्होंने तर्क दिया कि विभागीय जांच के दौरान याची की आयु का निर्धारण वैज्ञानिक प्रणाली से कराए जाने की आवश्यकता थी। इसके अलावा अभिलेखों की जांच में भी विद्यालय के प्रबंधक व प्रधानाचार्य को शामिल नहीं किया गया है।
न्यायालय ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि आयु निर्धारण के लिए जांच दल को आधुनिक मेडिकल पद्धति का सहयोग लेना था, जबकि अभिलेखों के सत्यापन के लिए विद्यालय के अधिकारियों को जांच में शामिल कर रिकॉर्ड तलब करने चाहिए थे। इसके साथ ही न्यायालय ने कहा कि चूंकि विभाग ने याची को इन्हीं आरोपों पर 2016 में दोषमुक्त पाया था, ऐसी स्थिति में दोबारा जांच नए ठोस कारणों के मिलने पर ही की जा सकती थी।