ऐसे हुआ शोध
वैज्ञानिक दल ने प्रयागराज की कटरा मंडी से काली गाजर खरीदी। गैर संक्रमित, गैर धबबेदार, स्वस्थ, सामान रंग वाली परिपक्व काली गाजरों को पानी से धोकर साफ किया गया। फिर कमरे के तापमान पर सुखाया गया। ऐसा करने से काली गाजर की सतह पर उपस्थित अशुद्धियां समाप्त हो जाती हैं। फिर गाजर के फलों को पेप्लान लेपित स्टील के चाकू से विभिन्न भागों में काटा गया। इसके बाद काली गाजर के कटे हुए विभिन्न भागों का रमन स्पेक्ट्रोस्कॉपी और लेजर इंड्यूस्ड स्पेक्ट्रोस्कोपी की मदद से वर्णक्रम यानी स्पेक्ट्रम प्राप्त किया गया। प्राप्त स्पेक्ट्रम के विश्लेषण से काली गाजर की विभिन्न परतों में अलग-अलग मात्रा में जैविक योगिकों की समृद्ध उपस्थिति का पता चला।
काली गाजर में 40 फीसदी अधिक एंथोसाइनिन
प्रो. केएन उत्तम के अनुसार पीली या लाल गाजर के मुकाबले काली गाजर में एंथोसाइनिन की मात्रा 40 फीसदी अधिक होती है। ये तथ्य भी शोध के दौरान सामने आए। यही वजह है कि पीली और लाल गाजर के मुकाबले काली गाजर गंभीर बीमारियों से बचाने में ज्यादा कारगर है।