इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रेलवे कर्मचारियों की वरिष्ठता विवाद से जुड़े मामले में राहत देते हुए अपना सात साल पुराना आदेश वापस ले लिया है। साथ ही केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) का आदेश भी रद्द कर दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की खंडपीठ ने अशोक यादव व दो अन्य की समीक्षा याचिका पर दिया। मामला झांसी के उत्तर मध्य रेलवे से जुड़े प्रशिक्षित अप्रेंटिस कर्मचारियों की वरिष्ठता और प्रोन्नति का था। याची अशोक और अन्य का कहना था कि उन्होंने अप्रेंटिस परीक्षा में एक व्यक्ति से अधिक अंक प्राप्त किए थे, फिर भी उन्हें वरिष्ठता और नियुक्ति में पीछे रखा गया। कम अंक पाने वाले व्यक्ति को 1990 में नौकरी दे दी गई थी।
याचियों की ओर से अधिवक्ता ने दलील दी कि 2001 में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण की प्रधान पीठ, नई दिल्ली में याचिका दाखिल की थी। वहां से प्रशिक्षित अप्रेंटिस की वरिष्ठता मेरिट और बैच के अनुसार तय करने का आदेश हुआ था। रेलवे प्रशासन ने इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन वहां भी राहत नहीं मिली। रेलवे ने सात मई 2013 को उन्हें नियुक्ति दी और 2014 में नियमित किया। बाद में उनकी वरिष्ठता सूची जारी हुई। याचियों ने वरिष्ठता सूची को गलत बताते हुए दोबारा कैट में चुनौती दी।
कैट और बाद में हाईकोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि मामला बहुत पुराना है और 26 साल बाद उठाया गया है। कोर्ट ने कहा कि जब तक कोई व्यक्ति सेवा में नियुक्त ही नहीं होता, तब तक उसके लिए वरिष्ठता का विवाद पैदा नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा कि याची लगातार 2001 से अपने अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ते रहे और उन्हें लापरवाही या देरी का दोषी नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले एस नागराज बनाम कर्नाटक राज्य का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी न्यायिक आदेश से तथ्यात्मक भूल के कारण अन्याय हो रहा हो तो उसे सुधारना अदालत का कर्तव्य है।