जांच में डिग्री अमान्य करार दिया गया
अवर अभियंता के पांच फीसदी पद लिपिकों की पदोन्नति के जरिए भरे जाने थे, लेकिन नियमों को ताक पर रख दिया गया। इतना ही नहीं, इसके लिए इंजीनियरिंग का डिप्लोमा करने वाले लिपिकों को पात्र माना गया था। लेकिन, तमाम लिपिकों ने राजस्थान के एक विश्वविद्यालय के अलावा कई निजी संस्थानों से दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से दो वर्षीय डिप्लोमा हासिल कर लिया। फिर, इसी डिप्लोमा के आधार पर 122 लिपिकों को जेई बना दिया गया। जबकि, नियुक्ति से पहले डिप्लोमा का सक्षम संवैधानिक संस्था से सत्यापन करवाया जाना चाहिए था।
ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजूकेशन (एआईसीटीई) और डिस्टेंस एजुकेशन ब्यूरो (डीईबी) की ओर से भी दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से लिए गए डिप्लोमा को अमान्य करार दिया जा चुका है। बावजूद इसके अभी तक इस मामले की पत्रावली दबाकर रखी गई थी और गलत तरीके से प्रमोशन पाने वाले अवर अभियंताओं से ही काम लिया जाता रहा।
प्रोन्नति देने वाले कार्मिकों की भूमिका भी शक केदायरे में
सूत्रों के मुताबिक, जब इन बाबुओं को प्रोन्नत किया जा रहा था, उस वक्त भी पीडब्ल्यूडी मुख्यालय में तैनात तत्कालीन स्टाफ आफिसर ने इस पर आपत्ति जताए हुए वरिष्ठ अधिकारियों को चेताया था। लेकिन, उस वक्त इस पर ध्यान नहीं दिया गया। पीडब्ल्यूडी के ही एक अधिकारी कहते हैं कि नियमविरुद्ध प्रोन्नति क्यों दी गई। इसके कारणों की जांच करा ली जाए, तो प्रोन्नति देने के लिए जिम्मेदारी अधिकारी व कर्मचारी भी कार्रवाई से बच नहीं पाएंगे।