संगम की रेती पर तंबुओं की नगरी में परंपरागत रूप से माह भर के जप-तप, नियम-संयम का माह भर का कल्पवास पौष पूर्णिमा से आरंभ होकर माघी पूर्णिमा तक रहेगा। लेकिन, इस बार मकर संक्रांति का प्रमुख स्नानपर्व पौष पूर्णिमा से पहले ही पड़ रहा है, ऐसे में बड़ी संख्या में कल्पवासी मकर संक्रांति जैसे प्रमुख स्नानपर्व पर ही डुबकी लगाकर कल्पवास आरंभ करेंगे। वैसे पौष पूर्णिमा पर डुबकी लगाकर कल्पवास की शुरुआत करने वालों से इतर एक कल्पवास की शुरुआत मकर संक्रांति से ही हो जाएगी।
दरअसल मैथिल ब्राह्मणों का कल्पवास संक्रांति से संक्राति तक होता है। सो उनके कल्पवास की शुरुआत मकर संक्रांति से होगी जिसे अगली संक्रांति पर पूर्णता मिलेगी। इस परंपरा का निर्वाह करने वाले मुख्यत: बिहार और झारखंड के मैथिल ब्राह्मण होंगे लेकिन संक्रांति से संक्राति तक कल्पवास की परंपरा में उनके अतिरिक्त हिमाचल प्रदेश और नेपाल से आने वाले श्रद्धालु-कल्पवासी भी शामिल होंगे।