इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पॉक्सो एक्ट नाबालिगों का रक्षक है, प्यार का दुश्मन नहीं। किशोरावस्था में उपजी मोहब्बत के खिलाफ इसका इस्तेमाल हो रहा है। अदालत न पीड़िता के बयान को नजरअंदाज कर सकती है और न आरोपी को जेल में सड़ने के लिए छोड़ सकती है।
पॉक्सो कानून का मूल उद्देश्य किशोरों के बीच सहमति से बने संबंधों को अपराध बनाना नहीं था, लेकिन आजकल के मामलों से ऐसा लगता है कि इसका इस्तेमाल इसी तरह हो रहा है, जो चिंता का विषय है।
इस तल्ख टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति कृष्ण पहल की अदालत ने चंदौली के नाबालिग से यौन शोषण के आरोपी की जमानत मंजूर कर ली। कहा, यह मामला किशोरावस्था में उपजे प्रेम प्रसंग का है। पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज करवा कर इसे दूसरा रूप दिया जा रहा है। लिहाजा, अदालत पॉक्सो एक्ट के दुरुपयोग को बर्दाश्त नहीं करेगी।
अक्सर नासमझी में संबंध बनाने वाले किशोर पॉक्सो के जाल में फंस जाते हैं और जीवन को बर्बाद कर लेते हैं। पुलिस पीड़िता के बयान पर एकतरफा भरोसा कर आरोपी को जेल में डाल देती है।
-हाईकोर्ट
कोर्ट ने कहा-लिहाजा, ऐसे मामलों को संवेदनशीलता के साथ देखा जाना चाहिए। जमानत के मामले तय करते वक्त यह परखना जरूरी है कि मामला वास्तव में यौन शोषण का है या किशोरावस्था में पनपी मोहब्बत का।
सपरिवार दर्ज हुआ मुकदमा, जेल गया आरोपी
मामला चकिया थाना क्षेत्र का है। 15 फरवरी को पीड़िता के पिता ने युवक पर नाबालिग बेटी को बहला-फुसलाकर भगाने के आरोप में एफआईआर दर्ज कराई थी। साथ ही यह भी आरोप लगाया कि बेटी घर से नकदी व जेवर लेकर गई है। मामले में युवक के माता-पिता, भाई व बहन को भी नामजद किया गया है। पुलिस ने आरोपी को पॉक्सो एक्ट के तहत गिरफ्तार कर सात मार्च को जेल भेज दिया।
पीड़िता सहमति से साथ गई थी
रिहाई के लिए प्रेमी ने पहले सत्र अदालत, इसके बाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उसके अधिवक्ता ने दलील दी कि एफआईआर 15 दिन देरी से दर्ज की गई है। आरोप झूठे थे। उम्र को लेकर कोई मेडिकल जांच नहीं की गई है। पीड़िता सहमति से याची के साथ गई थी। दोनों एक-दूसरे से प्यार करते हैं।