बच्चे को लेकर मां और दादी में चल रहा है विवाद
कोर्ट ने हिंदू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम-1956 की धारा 6 (ए) को ध्यान में रखते हुए कहा कि यह प्रावधान संरक्षकता के भेद में अंतरिम कस्टडी के अपवाद को बताता है और निर्दिष्ट करता है कि जब तक बच्चा पांच साल से कम उम्र का है तब तक बच्चे को मां की ही कस्टडी में रखा जाना चाहिए। मामले में बच्चों की कस्टडी को लेकर दादी और मां के बीच विवाद चल रहा है। कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंची कि मां बच्चों की प्राकृतिक अभिभावक होने के नाते दादी या उनके पिता की बहन (बुआ) की तुलना में बहुत अधिक ऊंचे पायदान पर खड़ी है। एक बच्चे के जीवन में मां के प्रेम की आवश्यकता अधिक है।
बच्चे खेलने की वस्तु नहीं, उनका कल्याण सर्वोपरि
कोर्ट ने कहा कि बच्चे अपने माता-पिता के खेलने की चीजें नहीं हैं। उनका कल्याण सर्वोपरि है और जब मां उनके साथ होगी तो उनकी अच्छी तरह से रक्षा हो सकेगी। एक बच्चे के जीवन में विश्वास और भावनात्मक अंतरंगता की मजबूत नींव स्थापित करने के लिए मां का प्यार बिना शर्त के मिलना चाहिए। अगर इस प्यार को रोक दिया जाता है तो बच्चा इस प्यार को पाने केलिए कई तरीकों से ढूंढेगा।
हम अपने बच्चों को घर पर जो भावनात्मक नींव देते हैं वह उनके जीवन की नींव है। हम घर के मूल्य और एक मां के प्यार की शक्ति को कम करके नहीं आंक सकते हैं। कोर्ट ने बच्चों के प्रति मां के अधिकार को प्रमुखता दी और बच्चों को उनकी मां को सौंप दिया। हालांकि, कोर्ट ने दादी को भी यह अधिकार दिया कि वह चाहे तो सप्ताह में एक बार यानी प्रत्येक शनिवार को दोपहर 12.00 बजे से शाम 05.00 बजे के बीच अपने पौत्र-पौत्री से मिल सकती है।