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संवैधानिक पदों पर नियुक्ति में न हो राजनीति

Sat, 08 Aug 2015 01:28 AM IST
योगेंद्र मिश्र/अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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इलाहाबाद। मुकदमों के जल्द निस्तारण में विश्व रिकार्ड बनाने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति रवींद्र सिंह का नाम एक बार फिर चर्चा में है। अबकी प्रदेश सरकार की ओर से  लोकायुक्त के तौर पर उनका नाम प्रस्तावित किए जाने से वह सुर्खियों में हैं। राज्यपाल ने जहां संवैधानिक प्रक्रिया का हवाला देकर लोकायुक्त के लिए उनके नाम का प्रस्ताव लौटा दिया है वहीं मामले पर सूबे में सियासी माहौल गरम है। शुक्रवार को जस्टिस रवींद्र सिंह ने ‘अमर उजाला’ से खास बातचीत में लोकायुक्त और न्यायिक सुधार सहित कई मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय रखी।
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0 आपने अपने कार्यकाल में रिकार्ड मुकदमों का निस्तारण किया है। जजशिप चाहे तो मुकदमों की पेंडेंसी को कम किया जा सकता है।

00  मैनें 11 वर्षों के कार्यकाल में 1,37,778 मुकदमों का निस्तारण किया। यदि न्यायाधीश अपना पूरा समय और मन लगाकर मुकदमों को तय करें तो दिन प्रतिदिन के निस्तारण पर काफी फर्क पड़ेगा। निश्चित तौर पर अधिक संख्या में मुकदमे निस्तारित किए जा सकते हैं।

0 न्यायपालिका में मुकदमों का बोझ कम करने के लिए और क्या कदम उठाए जा सकते हैं।
00 ज्यादातर जज कानून की किसी न किसी विधा के विशेषज्ञ होते हैं। उनको उसी क्षेत्राधिकार में बिठाया जाना चाहिए। इससे जज को मुकदमा तय करने में सुविधा होगी, साथ ही निर्णय भी सटीक होगा। उदाहरण के तौर पर मैं क्रिमिनल साइड का वकील था और बतौर जज भी पूरे समय क्रिमिनल साइड में ही बैठने का मौका मिला, जिससे मेरी ओर से ज्यादा मुकदमों के डिस्पोजल हुए।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट में पेंडेंसी अधिक होने की बड़ी वजह यहां जजों के स्वीकृत पदों को भरा नहीं जाना है। फिर यहां के जजों का केस डिस्पोजल रेट दूसरे हाईकोर्ट जजों से ज्यादा है।
0 क्या गंभीर मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए विशेष अदालत होनी चाहिए।
00 मैं इस व्यवस्था से सहमत नहीं हूं। हर मुकदमे को क्रम से तय करना होगा। खास मुकदमों को अलग करने से इस प्रक्रिया का कभी अंत नहीं होगा। इसके लिए अधिक जजों की जरूरत होगी वरना आम मुकदमे कभी तय नहीं हो पाएंगे।
0 लोकायुक्त के लिए सरकार ने आपका नाम राजभवन भेजा जबकि राज्यपाल ने उसे लौटाते हुए लोकायुक्त की चयन समिति का विवरण मांगा है। आप क्या कहेंगे।
00 संवैधानिक पदों पर चयन की एक प्रक्रिया होती है। नियुक्ति करने वाला संवैधानिक प्राधिकारी इससे बंधा होता है। नियुक्तियों में प्रक्रिया का पालन होना चाहिए।
0 कहा जा रहा है कि चीफ जस्टिस ने आपके नाम पर ऐतराज जताया है। क्या कहेंगे।
00 इसका कोई आधार नहीं है। कोई ऐसा पत्राचार भी नहीं है जिससे इस बात की पुष्टि होती है। ऐसे मामलों से संबंधित पत्राचार गोपनीय होते हैं। संवैधानिक मामलों में बिना ठोस आधार चर्चाएं नहीं की जानी चाहिए। ऐसे संवेदनशील मामलों में कयास लगाना उचित नहीं।
0 संवैधानिक पदों पर नियुक्ति को लेकर विवाद की स्थिति बनने लगी है। आप क्या कहेंगे।
00 मेरा विचार है कि जिस व्यक्ति को संवैधानिक दायित्व सौंपा जाए, वह अपनी सीमा में रह कर इसका निवर्हन करे तो विवाद नहीं होगा। संवैधानिक पदों की अपनी मर्यादा होती है जिसका पालन जरूरी है।
0 सरकार ने मुख्य न्यायाधीश को लोकायुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया से बाहर करने का निर्णय लिया है। क्या इसे आप उचित मानते हैं।
00 ऐसे निर्णय की पुष्टि नहीं है। विधान सभा में कोई बिल भी पेश नहीं किया गया है। जब तक व्यवस्था परिवर्तित न हो जाए कयास लगाना बेमानी है।
0 इन सारे विवादों के पीछे आप क्या वजह देखते हैं
00 मुझे लगता है इस मामले में राजनीति अधिक हो रही है। संवैधानिक पदों पर नियुक्ति को लेकर राजनीति नहीं की जानी। कुछ राजनीतिक दल बिना किसी आधार के बेतुके बयान दे रहे हैं। किसी भी बड़े पद पर नियुक्ति से पूर्व इसकी चर्चा होना दुखद है।
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