मतदान प्रतिशत भले ही घट गया हो लेकिन वोटरों की संख्या बढ़ गई है। ऐसे में चुनावी समकरण काफी उलझ गया है। पिछले चुनाव में हंडिया को छोड़ अन्य सभी विधानसभा क्षेत्रों में जीत-हार को जो अंतर है, बूथ पर जाकर वोट देने वालों की संख्या उससे कहीं अधिक है। ये नए वोटर अब नायक साबित हो सकते हैं। हालांकि पांच वर्षों में मतदाताओं की संख्या में छह लाख से अधिक का इजाफा हुआ है। ऐसे में पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार बूथों तक वोटरों का अधिक संख्या में पहुंचना लाजिमी है।
2012 के विधानसभा चुनाव में कुल 20 लाख 75 हजार 428 वोट पड़े थे जबकि इस बार कुल 23 लाख 61 हजार 498 वोटरों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। ऐसे में इस बार दो लाख 86 हजार 70 अतिरिक्त वोट पड़े। फाफामऊ विधानसभा क्षेत्र में 26792, सोरांव में 26037, फूलपुर में 35249, प्रतापपुर में 23698, हंडिया में 19488, मेजा में 23178, करछना में 19109, शहर पश्चिमी में 20877, शहर उत्तरी में 27758, शहर दक्षिणी में 31160, बारा में 17033 और कोरांव में 15691 नए वोटर बूथों तक पहुंचे। 2012 के चुनाव में फाफामऊ में 5296, सोरांव में 13301, फूलपुर में 7900, प्रतापुर में 12808, हंडिया में 45379, मेजा में 740, करछना में 404, शहर पश्चिमी में 8885, शहर उत्तरी में 16092, शहर दक्षिणी में 302, बारा में 3756 और कोरांव विधानसभा क्षेत्र में 7773 वोटों के अंतर से जीत-हार तय हुई थी। ऐसे में नए वोटर समीकरण को पलट सकते हैं। हालांकि इस बार परिस्थितियां भी अलग हैं। सभी प्रत्याशी और उनके समर्थक गुणा-गणित लगा रहे हैं कि ये नए वोटर किस दल से जुड़े हैं। किसी का दावा है कि इनमें सबसे अधिक मुस्लिम और दलित वोटर हैं तो कोई इनमें ओबीसी और सवर्ण वोटरों को शामिल मानकर चल रहा है। अब सबको 11 मार्च का इंतजार है, जब कंट्रोल यूनिट तय करेगी कि विधान सभा का कंट्रोल के किसके हाथ में जाता है।