इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कोविड महामारी के दौरान प्रशासनिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए किए गए तबादलों का मूल्यांकन संकीर्ण दृष्टि से नहीं किया जा सकता है। आपातकाल में अधिकारियों के ऐसे निर्णय जनहित में जरूरी होते हैं।
इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने गाजीपुर में तैनात रहे अधिकारी रमेश चंद्र उपाध्याय की वेतन वृद्धि पर रोक के दंडादेश को रद्द कर दिया। साथ ही लिफाफे में बंद प्रोन्नति के आदेश को खोलने का निर्देश दिया है।
याची पर गाजीपुर में तैनाती के दौरान तबादला नीति के उल्लंघन के आरोप लगाए गए थे। उन्होंने कोविड काल में अपने अधीनस्थ चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों का तबादला किया था। इस पर उनके खिलाफ शुरू हुई विभागीय कार्रवाई में उनकी वेतन वृद्धि पर रोक लगा दी गई थी। साथ ही प्रोन्नति के आदेश को बंद लिफाफे में रखा गया था।
इसके खिलाफ उन्होंने राज्य सेवा न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाया, न्यायाधिकरण ने उनके खिलाफ पारित दंडादेश पर मुहर लगा दी। इस आदेश को उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी।कोर्ट ने पाया कि दंड आदेश उस आरोप पर आधारित था जो साबित ही नहीं हुआ।
जांच में जिला मजिस्ट्रेट से पूछताछ तक नहीं की गई, जबकि याची ने डीएम की मौखिक अनुमति के बाद तबादला किया था। याची ने कोविड काल की आपात परिस्थितियों में प्रशासनिक जरूरतों को पूरा किया।