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बच्चों के कॅरियर को लेकर डिप्रेशन में आ रहे अभिभावक

Tue, 05 Apr 2016 01:26 AM IST
अविनाशी श्रीवास्तव, अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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पति और पत्नी दोनों डॉक्टर। पति एनेस्थिसिया के डॉक्टर और पत्नी प्रख्यात गाइकभनोलॉजिस्ट। शहर में बड़ा नर्सिंग होम। दो बेटे भी जिसमें से एक मेडिकल की पढ़ाई कर रहा और दूसरा तैयारी में जुटा है। यानी, सबकुछ अच्छा और कष्ट का कोई कारण नहीं लेकिन पत्नी ने आत्महत्या कर ली। वजह बनी बेटाें के कॅरियर को लेकर अत्याधिक चिंता। परिवार वालों तथा अन्य लोगों ने बताया कि वह बच्चों की हर गतिविधि तथा प्रोग्रेस रिपोर्ट को लेकर अधिक टेंशन लेती थीं और धीरे-धीरे इस कदर डिप्रेशन का शिकार हुईं कि  आत्महत्या जैसा कदम उठा लिया।
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अपने बच्चों के कॅरियर को लेकर अत्यधिक जागरूकता दिखाने वाले अभिभावकों के लिए यह घटना चेतावनी देने वाली है। सपनों के बोझ तले दबे किशोर और युवाओं में आत्महत्या की घटनाएं लगातार हो रही हैं। अब अभिभावक भी इस डिप्रेशन की गिरफ्त में हैं। यह स्थिति मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों के लिए भी हैरान करने और चिंता बढ़ाने वाली है। उनका कहना है कि रुझान और क्षमता का आकलन किए बिना उम्मीदों का बोझ लादना बच्चों को तो पंगु बना ही रहा है, अभिभावक भी अवसाद में जा रहे हैं। अभिभावकों के आत्महत्या करने की घटनाएं कम जरूर हैं, लेकिन बच्चों के कॅरियर की अत्याधिक चिंता को लेकर उनके अवसाद में पहुंचने के मामले लगातार बढ़ रहे हैं।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग की प्रोफेसर दीपा पुनेठा का कहना है कि जीवन में बहुत सफल लोग भी इस बीमारी का शिकार हैं। वह सोचते हैं कि बच्चे उनसे भी अच्छा करें। वह उनसे बहुत सी उम्मीदें पाल लेते हैं। कई अभिभावक इन उम्मीदों को पूरा करने के लिए पूरी तरह से खो जाते हैं और हर कदम पर बच्चे को नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं। इससे बच्चे की सोचने की क्षमता भी कुंठित हो जाती है। धीरे-धीरे उसका मानसिक और शारीरिक विकास अवरुद्ध हो जाता है और वह जीवन भर के लिए दूसरों के भरोसे हो जाता है। इन प्रयासों के बीच अभिभावक  को लगने लगता है कि उनके कंट्रोल में तो कुछ है ही नहीं। यही सोच धीरे-धीरे अवसाद का रूप ले लेती है और वे कोई भी आत्मघाती कदम उठा लेते हैं। इसी क्रम में मोतीलाल नेहरू मेडिकल कालेज के
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कॅरियर के चुनाव के समय ही सतर्कता बरतने की जरूरत है। ज्यादातर अभिभावक बच्चों पर अपनी सोच थोपते हैं। मेडिकल कालेज के डॉ.वीके सिंह का कहना है यह काफी खतरनाक स्थिति है। इसकी हर स्तर पर आलोचना करने की जरूरत है। बच्चों के कॅरियर की दिशा निर्धारित करते समय हर पहलू को ध्यान में रखा जाना चाहिए। कॅरियर निर्धारण में काउंसलर की भी मदद ली जा सकती है।

बच्चाें पर खुद की सोच थोपना सरासर गलत है। मैंने खुद इसका नुकसान उठाया है। अभिभावक सोचते हैं कि उनके बच्चे केबारे में उनसे अच्छा कोई सोच ही नहीं सकता। इस धारणा में वे बच्चे की रुचि और उसकी इच्छा को भी दबा देते हैं। इसके अलावा कॅरियर को लेकर बाहरी दबाव भी अभिभावकों को काफी हद तक प्रभावित करती है। वे उसी दिशा में जाना चाहते हैं, जिधर अन्य जा रहे हैं। यह ठीक नहीं है। मैंने बच्चों पर जब भी अपनी सोच थोपी वे अच्छा नहीं कर पाए लेकिन जहां छूट दी वे बेहतर करने में सफल रहे। हमें अपने समय को याद करना चाहिए, जब कॅरियर चुनने का पूरा अधिकार था। वही छूट आज के बच्चों को भी मिलनी चाहिए। हां, वह भटके नहीं इसलिए नजर जरूर रखनी चाहिए लेकिन जबरदस्ती नहीं।’
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0 प्रोफेसर माता अंबर तिवारी, पूर्व डीन साइंस, इविवि
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