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अफसरों की नाक के नीचे अभिभावकों से लूट

Tue, 29 Mar 2016 02:11 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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अगले कुछ दिनों में कान्वेंट स्कूलों में नई क्लास शुरू हो जाएंगी। कई स्कूलों में नर्सरी से कक्षा नौ एवं कक्षा 11 तक के परिणाम घोषित हो चुके हैं, कुछ में अगले दो-तीन दिन में घोषित होंगे। नई क्लास में गए बच्चों के लिए अभिभावक कॉपी-किताबें खरीदने में जुट गए हैं। स्कूल में खुले काउंटरों और वहां से अधिकृत दुकानों में कॉपी-किताबों पर मनमानी कीमतें प्रिंट कराके लागत से कई गुना अधिक दाम वसूला जा रहा है। छोटी कक्षाओं के लिए दुकानों में पूरा बैग तैयार रखा है और उसे बेहद ऊंची कीमत पर बेच रहे हैं। मजे की बात यह कि दुकानों में इसका कैशमेमो भी नहीं दिया जाता। अकेले सिविल लाइंस में वाणिज्य कर विभाग की नाक के नीचे कई कॉपी-किताब की दुकानों में बड़े पैमाने पर टैक्स चोरी हो रही है। यह काम बिना अफसरों की मिलीभगत के संभव नहीं है। बाट-माप विभाग भी कॉपियों की बेतहाशा बढ़ी कीमतों को लेकर कोई कार्रवाई नहीं कर रहा।
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कान्वेंट स्कूलों में नई क्लास शुरू होने के साथ ही अभिभावकों की जेब कटने लगती है। जिन अभिभावकों के दो या उससे अधिक बच्चे ऐसे स्कूलों में पढ़ रहे हैं, उनके लिए तो कॉपी-किताबों से लेकर ड्रेस, जूता-मोजा आदि खरीदना बेहद भारी पड़ता है। स्कूल प्रबंधन से लेकर कॉपी-किताब और ड्रेस की दुकानों तक में अभिभावकों से मोटी रकम वसूली जाती है। कुछ स्कूलों में काउंटर खोलकर कॉपी-किताबें और ड्रेस बेची जाती है, जबकि ज्यादातर स्कूल प्रबंधन ने बाहर दुकानें अधिकृत कर रखी हैं।
सिविल लाइंस और आसपास के कान्वेंट स्कूलों ने महात्मा गांधी मार्ग पर स्थित कुछ दुकानों को अधिकृत कर रखा है, जहां से स्कूल प्रबंधन को मोटा कमीशन मिलता है। बदले में इसका बोझ अभिभावकों पर पड़ रहा है। कागज-कॉपी व्यावसायिक संघ के संरक्षक संतोष पनामा का कहना है कि जो कॉपियां अधिकतम 20 रुपये तक मिलनी चाहिए, बड़ी कंपनियों के नाम पर उनकी मोटी कीमत वसूली जा रही है। दुकानों में छोटी कक्षाओं के बस्ते तैयार हैं, जिसे छह-आठ हजार रुपये तक में बेचा जा रहा है। किताब को छोड़कर पाठ्य सामग्री से जुड़ी हर वस्तु, ड्रेस, जूता-मोजा टैैक्स के दायरे में है, लेकिन इसकी बिक्री कैशमेमो में पर न करके बड़े पैमाने पर टैक्स की चोरी हो रही है।
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35 में 15 रुपये की कॉपी, 50 की किताब 120 रुपये में
दुकानदार कॉपी-किताबों में बेतहाशा कीमत वसूल रहे हैं। बड़ी कंपनियों के नाम पर 120 पेज की कॉपी पर एमआरपी 35 रुपये छपवाकर बेची जा रही है, जबकि यही लोकल बनी हुई कॉपी 12-15 रुपये में उपलब्ध है। यही हाल किताबों का है। जिस किताब का मूल्य 50 रुपये नहीं है, उस पर 120-150 रुपये तक एमआरपी छापकर बेचा जा रहा है। स्कूलों ने दुकानें अधिकृत रखी हैं और रिजल्ट के साथ दुकान के नाम की लिस्ट अभिभावकों को थमा दी जाती है। ऐसी दुकानों में स्कूल के नाम छपा हुए कवर कॉपी-किताबों पर चढ़ा कर दिए जाते हैं, सो अभिभावकों के सामने किसी और दुकान का विकल्प भी नहीं होता।

वसूल रहे बेतहाशा कीमत, नहीं देते कैशमेमो
अकेले सिविल लाइंस की बात करें तो यहां महात्मा गांधी मार्ग पर कई स्टेशनरी शॉप हैं, जो किसी न किसी स्कूल से अधिकृत हैं। इन दुकानों में अभिभावक जो भी कॉपी-किताबें, ड्रेस आदि खरीदते हैं, उसकी पक्की रसीद नहीं दी जाती। इन दुकानों में हर क्लास के लिए कॉपी-किताबों का बंडल बांधकर रखा जाता है। अभिभावक जिस क्लास के लिए मांग करते हैं, बंडल थमा दिया जाता है और कैशमेमो के नाम पर सादे कागज पर एकमुश्त कीमत लिखकर दे दी जाती है। दुकानदार पक्का कैशमेमो न देकर बड़े पैमाने कर टैक्स की चोरी कर रहे हैं, लेकिन इन दुकानों से चंद कदम की दूरी पर बैठे वाणिज्य कर विभाग के अफसर इस ओर ध्यान ही नहीं दे रहे हैं। यह काम शायद अफसरों की मिलीभगत से हो रहा है। दुकानों में अभिभावकों से ली जा रही अनाप-शनाप कीमतों को लेकर बाट-माप विभाग भी कभी कार्रवाई नहीं करता।
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