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मुद्दों पर मतभेद में उलझी वाम छात्र राजनीति

Wed, 16 Mar 2016 01:48 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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JNU - फोटो : Amar Ujala
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जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में लगे देश विरोधी नारों से वामपंथी राजनीति सवालों के घेरे में है। वामपंथियों पर राष्ट्रद्रोह के आरोप सहित जेएनयू को राष्ट्रविरोधियों का अड्डा कहा जा रहा है। हालांकि वाम छात्र राजनीति के पैरोकार इससे कतई इत्तेफाक नहीं रखते हैं। वैचारिक स्तर पर भले ही उनके बीच बिखराव हो लेकिन देशविरोधी गतिविधियों से उनका कोई सरोकार नहीं है। कुछ बाहरी तत्वों की लगाई आग की आंच उन तक पहुंची है जिससे पूरा वाम बदनाम हो रहा है। उनका दावा है कि छात्र राजनीति हमेशा देश की राजनीतिक दशा से जुड़कर ही आगे बढ़ी। हमेशा उन्हीं मुद्दों को लेकर आंदोलन किए गए जो जनतांत्रिक और राष्ट्रवादी विचारधारा के पोषक रहे।
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दरअसल जेएनयू की स्थापना से ही वहां की छात्र राजनीति की कमान वामपंथी पार्टियों से जुड़े छात्र संगठन स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई), ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन (एआईएसएफ), आल इंडिया स्टूडेंट आर्गनाइजेशन (आइसा), ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन (एआईडीएसओ) के हाथों में रही है। देश में नक्सलवादी मूवमेंट बढ़ने केसाथ एक दूसरा वामपंथी छात्र संगठन प्रोग्रेसिव स्टूडेंट आर्गनाइजेशन (पीएसओ) खड़ा हुआ। हालांकि 1990 के बाद इस संगठन ने अपना नाम बदलकर आइसा रख लिया। देश में जेएनयू के साथ कई अन्य विश्वविद्यालयों में इसकी दखल है। इलाहाबाद विवि में इस छात्रसंगठन ने कई छात्रनेता दिए हैं। इसके अलावा एआईडीएसओ, डीएसओ सहित कई वामपंथी छात्रसंगठनों का भी देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में प्रभाव है।

बता दें, एआईएसएफ, आईसा, एसएफआई और एआईडीएसओ सहित विभिन्न छात्र संगठन इस मामले में बुनियादी समझ रखते हैं कि ‘भारत में जनवादी क्रांति की जरूरी है।’ बाकी देश के कई सामाजिक , आर्थिक, राजनीतिक मुद्दों पर इनकी अपनी अलग राय है, अपनी समझ है। जहां आइसा अपने आप को वामपंथी छात्र संगठन की श्रेणी में रखती है वहीं एसएफआई जनवादी विचारधारा की मुखर पक्षधर है। एसएफआई का मानना है कि देश में वामपंथ को दूर की कौड़ी मानता है। यह भी कि जनवाद को पूरी तरह से लागू होने की जरूरत है।
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आइसा जहां गांधीवाद, आर्यसमाज, क्षेत्रीय दलों की जनतांत्रिक आंकाक्षाओं को नकारता है वहीं एसएफआई राष्ट्रीय मूवमेंट से जुडे़, सामाजिक, राजनीतिक आंदोलनों की अगुवाई करने वाली सभी विचारधाराओं का समर्थन करती है। एसएफआई के पूर्व प्रदेश सचिव अखिल विकल्प कहते हैं, इससे एक जनवादी माहौल बनता है। उधर, एआईएसएफ कांग्रेस केनेतृत्व से ही जनतंत्र के विकास का समर्थन करती है, जबकि एसएफआई का मानना है कि कांग्रेस के नेतृत्व में देश हाशिए पर चला जाएगा। एआईडीएसओ आर्थिक आधार पर आरक्षण दिए जाने, स्कूलों में यौन शिक्षा दिए जाने, के साथ स्वाधीनता संग्राम में सामाजिक और राजनीति समझ में भी लिंग के आधार पर दूसरे वामपंथी संगठनों से भिन्न राय रखती है।

देश की छात्र राजनीति में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) और वामपंथी छात्र संगठनों के बीच हमेशा टकराहट रही। दोनों एक-दूसरे की आलोचना केसाथ मात देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं। एबीवीपी जहां वामपंथी छात्र संगठनों को राष्ट्रविरोधी, देशद्रोही के चश्मे से देखती है, वह हिंदुत्ववादी विचारधारा का पोषक है।

देश में मुख्य वामपंथी राजनीति की शुरुआत 1936 में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के बाद हुई है। 1936 में  इंडियन पीपुल थिएटर एसोसिएशन (इप्टा), प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) के साथ देश में एआईएसएफ की स्थापना हुई। एआईएसएफ से जुड़े दो तिहाई छात्र एसएफआई में शामिल हो गए। वर्तमान में एआईएसएफ का दायरा सिमटकर कई विश्वविद्यालयों तक ही सीमित है जबकि एसएफआई का दायरा बढ़ा है। एआईडीएसओ का भी 1948 में देश में दूसरे छात्र संगठनों एबीवीपी, एनएसयूआई आदि के साथ ही उदय हुआ।
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