इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि बिना दूसरे पक्ष को नोटिस दिए या उनका पक्ष जाने उप-जिलाधिकारी (एसडीएम) की ओर से पुराना आदेश बदलना पूरी तरह से कानूनन अमान्य है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक प्रभावित पक्ष को अपना पक्ष रखने का अवसर न मिले, तब तक पूर्व में दिए गए किसी भी निर्णय को रिव्यू के माध्यम से खारिज नहीं किया जा सकता।
यह आदेश न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की एकल पीठ ने उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम की धारा 229-बी के तहत दर्ज एक पुराने भूमि विवाद में प्रयागराज निवासी खिन्नी लाल की ओर से दायर याचिका पर दिया है।
अदालत ने एसडीएम की ओर से 11 नवंबर 1991 को जारी मुकदमा खारिज करने का आदेश और 30 अगस्त 1992 को समीक्षा याचिका स्वीकार कर वादियों के पक्ष में सुनाया गया निर्णय को निरस्त कर दिया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रक्रियात्मक त्रुटियों के कारण इस 35 साल पुराने विवाद को पुनः उसके प्रारंभिक रूप में बहाल किया जाना आवश्यक है। कोर्ट ने संबंधित उप-जिलाधिकारी को आदेश दिया है कि वे सभी संबंधित पक्षों को विधिवत नोटिस भेजकर तामील कराएं और मामले की नए सिरे से साप्ताहिक आधार पर सुनवाई करें। कोर्ट ने एसडीएम को एक वर्ष की समयावधि के भीतर मुकदमे का अंतिम निस्तारण करने का निर्देश दिया है तब तक संपत्ति और अभिलेखों पर यथास्थिति बनी रहेगी।