इलाहाबाद। आपातकाल के चार दशक पूरा होने के बाद एक बार फिर हालात वर्ष 1975 जैसे ही बन रहे हैं। यह कहना है लोकतंत्र के उन पहरुओं का जिन्होंने आपातकाल का दंश झेला और उसके साझी रहे। ‘अमर उजाला’ ने आपातकाल पर सवाल किया तो उनकी यादें ताजा हो उठीं। स्मृतियां सहेजते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि एक बार फिर वैसे ही हालात नजर आ रहे हैं। मोदी सरकार भी इंदिरा गांधी की तर्ज पर तानाशाही रवैया अपना रही है। सरकार का रवैया ‘वन मैन शो’जैसा है?
वरिष्ठ केंद्रीय कर्मचारी नेता कृपाशंकर श्रीवास्तव ने कहा, देश के दूसरे हिस्सों की तरह शहर से भी राजनीति से जुड़े नेताओं की गिरफ्तारियां होने लगी थीं। 29 जून 1975 को मुरली मनोहर जोशी, जनेश्वर मिश्र, मेरे जैसे नेताओं की गिरफ्तारी हुइ और मीसा लगाकर जेल में बंद कर दिया गया। इसके बाद वर्तमान गृहमंत्री राजनाथ सिंह, कांग्रेसी नेता सत्य प्रकाश मालवीय सहित 40 और लोगों को गिरफ्तार किया गया जबकि 14 लोग डिफेंस ऑफ रुल्स (डीआईआर) के तहत बंदी बनाए गए। डीआईआर के तहत बंद होने वाले हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते थे लेकिन मीसाबंदी की सुनवाई नहीं थी। उन्हें तीन वर्षों तक परिवार वालों से मिलने तक नहीं दिया गया। रेडियो, समाचार पत्रों से भी वंचित रहे। ऐसे लोगों को नैनी, फतेहपुर, भोपाल, बरेली, बिहार की सेंट्रल जेलों में रखा गया।
उस समय जो हालात बने थे कमोवेश आज भी वैसे ही हालात नजर आ रहे हैं। सपा के वरिष्ठ नेता केके श्रीवास्तव कहते हैं कि दूसरे नेताओं के साथ उन्हें भी गिरफ्तार कर नैनी जेल रखा गया। उस समय राजनीतिक बात करना गुनाह जैसा था। मीसाबंदियों का बाहर की दुनिया ने नाता ही टूट गया था। आज कमोवेश वैसी ही स्थितियों में आम आदमी परेशान है। तब अंडरग्राउंड रहे सीटू नेता हरीशचंद्र द्विवेदी कहते हैं कि इंदिरा गांधी के गरीबी हटाओ के नारे की तरह मोदी ने भी जनता से बहुत सारे वायदे किए हैं। वायदे तो पूरे नहीं हुए, वह मोदी तानाशाही की ओर जरूर बढ़ रहे हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता आडवाणी भी यह दर्द बयां कर चुके हैं। किसान मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हृदय नारायण शुक्ला कहते हैं, आपातकाल का दंश बयां करने लायक नहीं है। कामना है कि देश दोबारा उन स्थितियों की ओर न लौटे।