इलाहाबाद। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रियदर्शिनी छात्रावास की एमए अंतिम
वर्ष की सानिया की सुबह सहरी से पहले होती है। तकरीबन तीन बजे उठने के बाद
वह हॉस्टल में रहने वाली दूसरी रोजेदारों को जगाती हैं। संग-संग सहरी, फिर
फजिर की नमाज अदा करती हैं। माहे मुकद्दस की रवायतों में रत्ती भर भी
तब्दीली मंजूर नहीं सो हॉस्टल के कमरे में कुरान शरीफ न होने के बावजूद
स्मार्टफोन पर ही कुरानपाक की तिलावत करती हैं। आम दिनों में भले ही पांचों
वक्त की नमाज न पढ़ पाएं लेकिन रमजान में इसके लिए वक्त निकाल लेती हैं।
रोजे पर मुकम्मल अमल के साथ रोजमर्रा के काम भी करती हैं।
माहे
मुकद्दस में सानिया की तरह ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय के महिला छात्रावासों
में रहने वाली तमाम मुस्लिम छात्राओं की दिनचर्या पूरी तरह से बदल गई है।
अपने घरों से वह भले ही दूर हैं लेकिन रमजान की सभी रवायतों को बाकायदा
पूरा कर रही हैं। खास यह कि रमजान की फजीलतें हासिल करने में सभी साथ हैं,
सभी की कोशिश होती है कि तय वक्त पर न किसी की सहरी छूटे, न इफ्तार।
प्रियदर्शिनी
छात्रावास के परास्नातक की राजिया बेगम, आशिया, फरजाना कहती हैं कि घर पर
होती तो सहरी और इफ्तार के लिए काफी कुछ इंतजाम रहता है। हॉस्टल में ऐसा
मुमकिन नहीं है। इफ्तारी के लिए कुछ न कुछ बना लिया या फिर बाजार से खरीद
लिया। कॅरियर बनाने के लिए घर छोड़कर हॉस्टल में रह रहे हैं लेकिन हमारी
रवायतें तो हमारे साथ हैं। सहरी, इफ्तार में हम साथ होते है तो घर जैसा ही
माहौल हो जाता है, सो सुकून मिलता है और खुशी भी।