इलाहाबाद। सरकारी दफ्तरों में भले ही हर साल हिंदी पखवाड़ा मनाया जाता हो लेकिन इन विभागों में ज्यादातर काम अंग्रेजी भाषा में ही होते है। कहने को सरकारी विभागों ने हिंदी में वेबसाइट बना रखी है लेकिन प्रमुख जानकारियां अंग्रेजी भाषा की वेबसाइट में ही मिलती हैं। समय-समय पर नियुक्ति संबंधी तमाम आदेश जारी होते रहते हैं और इनमें से ज्यादातर अंग्रेजी भाषा में होते हैं। यही वजह है कि जब नौकरी की बात आती है तो अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थियों को ही तरजीह दी जाती है। हिंदी और अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थियों के बीच समय के साथ यह फासला और तेजी से बढ़ता जा रहा है।
जानकारों के मुताबिक यूपी में हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों की संख्या अगर 100 है तो अंग्रेजी माध्यम के महज 10 विद्यार्थी हैं लेकिन निजी या सरकारी सेवा में चयन के वक्त यह अनुपात पलट जाता है। लिखित परीक्षा में भले ही हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों का चयन हो जाए लेकिन इंटरव्यू या ग्रुप डिस्कशन के दौरान फार्राटे से अंग्रेजी बोलने वालों के हाथ ही बाजी आती है। स्पष्ट है कि समय के साथ अंग्रेजी की मांग भी तेजी से बढ़ी है।
निजी क्षेत्र के स्कूलों ने भी इस जरूरत को समझते हुए खुद को तेजी से बदला और अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई के दायरा बढ़ाने में कोई संकोच नहीं किया लेकिन सरकारी स्कूल एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सके। शासन के आदेश के बावजूद यूपी बोर्ड के स्कूलों ने अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई की व्यस्था लागू नहीं की। अंग्रेजी की अहमियत यहीं खत्म नहीं होती, यूपीएससी की परीक्षाओं में तो पैटर्न में बदलाव के बाद अंग्रेजी- हिंदी के बीच का फासला और गहरा गया है। प्रतियोगी परीक्षाओं में हिंदी माध्यम के अभ्यर्थी लगातार पिछड़ रहे हैं जबकि इससे पूर्व यूपीपीएससी की परीक्षाओं पर हिन्दी माध्यम के छात्रों का एकाधिकार रहता था लेकिन तेजी से बदली परिस्थिति में अब लगभग आधी सीटों पर अंग्रेजी माध्यम के छात्रों का ही कब्जा रहता है। बैंकिंग, एनडीए, सीडीएस, एसएससी जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में तो अंग्रेजी वालों का ही बोलबाला है।
‘अकेले इलाहाबाद जिले में यूपी बोर्ड से जुड़े लगभग एक हजार सरकारी इंटर कॉलेज हैं, इसके विपरीत शहर में सीबीएसई से जुड़े तकरीब 40 विद्यालय हैं। वहीं, आईसीएसई बोर्ड से जुड़े 10 विद्यालय संचालित हैं। आईआईटी एवं मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं के परिणाम आने के बाद जिले में सीबीएसई और आईसीएसई से जुड़े 50 विद्यालयों से चयनितों की संख्या के मुकाबले जिले के सरकारी यूपी बोर्ड से जुड़े एक हजार कॉलेजों से चयनितों की संख्या कई गुना कम होती है।’
संजय श्रीवास्तव, वरिष्ठ शिक्षक टीपीएस
नेशनल एवार्डी
वित्त विहीन विद्यालयों ने जगाई आस
- ‘यूपी बोर्ड की ओर से हाल में खुले कुछ निजी वित्तविहीन विद्यालयों ने अंग्रेजी की जरूरत को समझा। हिंदी माध्यम में पढ़ाई कराने के बावजूद उन्होंने अंग्रेजी पर भी विशेष ध्यान दिया। नतीजा कि आईआईटी एवं मेडिकल की बड़ी प्रवेश परीक्षाओं में इन विद्यालयों के छात्र-छात्राओं को आशा के अनुरूप सफलता मिल रही है।’
दिव्य कांत शुक्ल, प्राचार्य
राज्य शिक्षा संस्थान, उत्तर प्रदेश
अंग्रेजी के साथ बदले पढ़ाई का ढांचा
- ‘मातृभाषा होने के कारण हिन्दी की पढ़ाई जरूरी तो है लेकिन ग्लोबलाइजेशन के दौर में बिना अंग्रेजी भाषा पढ़े कुछ नहीं होने वाला। इसके लिए यूपी बोर्ड के स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई अनिवार्य करने के साथ स्कूलों के पाठ्यक्रम एवं पैटर्न में समग्र बदलाव भी करना होगा। ऐसे प्रयोगों के बाद ही अंग्रेजी-हिंदी के बीच फासले को कम किया जा सकता है।’
डॉ. एके वर्मा, कैरियर एक्सपर्ट
असिस्टेंट प्रोफेसर गवर्नमेंट पीजी कॉलेज, सैदाबाद, इलाहाबाद