इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि संदेह कितना भी गहरा हो, सुबूत का स्थान नहीं ले सकता। अभियोजन की कहानी में फावड़ा-हंसिया और खुरपी जैसे हथियारों की बरामदगी हो, वहां गर्दन पर महज एक चोट से घटना की विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाती है।
इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह और न्यायमूर्ति देवेंद्र सिंह प्रथम की खंडपीठ ने 38 साल पहले हुई एक बच्चे की हत्या के दोषी राम प्रकाश, रमेश, जगदीश और राम संजीवन को मिली उम्रकैद की सजा से बरी कर दिया। मामला जालौन के आटा थाना क्षेत्र का है। आरोप था कि आरोपियों में सितंबर 1988 में भद्रेखी गांव निवासी 12 वर्षीय बालक लक्ष्मी का अपहरण कर उसकी हत्या कर दी।
अभियोजन की कहानी के मुताबिक बालक मवेशी चराने खेत गया था। इसी दौरान दो पक्षों में विवाद में आरोपी पक्ष ने घटना का अंजाम भुगतने की धमकी दी थी। इसके बाद लापता बालक का शव मिला। 17 अक्तूबर 1989 को ट्रायल कोर्ट ने राम प्रकाश, रमेश, जगदीश, रामसजीवन, मट्टी, दलचंद और तुलसी राम को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ सभी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष परिस्थितियों की अटूट श्रृंखला को साबित करने में विफल रहा। चिकित्सा साक्ष्य में विरोधाभास मिला। बरामद हथियारों पर मौजूद खून की कोई फॉरेंसिक जांच रिपोर्ट पेश नहीं की गई थी। अपील के दौरान मट्टी, दल चंद और तुलसी राम की मौत ही गई। लिहाजा, बाकी बचे चारों अपीलार्थियों को हाईकोर्ट ने 38 साल बाद बेगुनाह करार दिया।