उन्होंने कहा कि संन्यासी अखाड़ों की उपस्थिति में ही शंकराचार्य की घोषणा होती रही है। इस तरह जल्दबाजी में शंकराचार्य के पद पर नियुक्ति सनातन धर्म के लिए नुकसानदायक है। स्मरण कराया कि इससे पहले वर्ष 1941 में स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती को इस पद पर पंचदशनाम जूना अखाड़ा व अन्य अखाड़ों की मौजूदगी में ज्योतिष पीठ गठित की गई थी। वसीयत के आधार पर शंकराचार्य पद पर नियुक्ति नहीं की जा सकती।
बकौल अखाड़ा परिषद अध्यक्ष, यह पद आदि शंकराचार्य की ओर से स्थापित चारों पीठों में से एक सर्वोच्च पद है। शंकराचार्य उसी को बनाया जा सकता है, जो आदि शंकराचार्य के संदेशों को जन-जन तक पहुंचाने वाला हो, जिसके पास जन समूह हो। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य के रूप में इसलिए भी मान्यता नहीं दी जा सकती, क्योंकि इस पीठ का विवाद सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। 12 सितंबर को परमहंसी आश्रम में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पट्टाभिषेक हुआ था।
द्वारका-शारदा, ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य रहे स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के ब्रह्मलीन होने के बाद दोनों पीठों पर उनके उत्तराधिकारी के तौर पर दो शंकराचार्यों की नियुक्ति की घोषणा की गई थी। तब इन पीठों पर स्वामी स्वरूपानंद के उत्तराधिकारी के तौर पर द्वारका-शारदा पीठ पर स्वामी सदानंद को और ज्योतिष पीठ पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य घोषित किया गया था।