वकील के मुताबिक, बयान लेने वाले मजिस्ट्रेट ने भी ट्रायल कोर्ट में बताया है कि कोली के बयान की रिकार्डिंग की चार सीडी बनाई गई थीं। इसमें दो ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड के लिए एसीएमएम कामिनी लाव को दी गईं, जबकि शेष दो सीडी सीबीआई के विवेचक को दी गईं। कोर्ट के रिकॉर्ड के लिए दी गई सीडी पर मजिस्ट्रेट और कोली ने दस्तखत भी किए थे। मगर, कोर्ट में जो सीडी पहुंचीं, उसमें मजिस्ट्रेट और कोली के दस्तखत उपलब्ध नहीं थे।
वकील का दावा है कि कलमबंद बयान असल में कलमबंद थे ही नहीं। विधिक प्रक्रिया में बयान तत्काल हूबहू लिपिबद्घ किया जाता है, लेकिन दस्तावेजों पर उपलब्ध साक्ष्यों से साफ है कि बयान की रिकार्डिंग की गई और उसे सुनकर बयान को लिपिबद्घ किया गया। मजिस्ट्रेट ने भी निचली अदालत में कहा है कि अदालत के सामने वो सीडी नहीं है, जिस पर उनके और कोली ने हस्ताक्षर थे।
हाईकोर्ट के समक्ष वकील ने यह भी दावा किया कि कोली ने जांच एजेंसी द्वारा दी जा रहीं अमानवीय यातनाओं की शिकायत भी की थी। हालांकि, मजिस्ट्रेट ने इन शिकायतों को नजरअंदाज करते हुए कोली को न्यायिक हिरासत में भेजने के बजाय सीबीआई के हवाले कर दिया। सीबीआई तमाम यातनाएं देकर उसे अगले दिन का बयान रटवाती थी।
कोली के वकील ने साक्ष्य अधिनियम की धारा 24 और 28 का जिक्र करतेे हुए यह साबित करने की कोशिश की कि कोली का मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज किया गया इकबालिया बयान संदिग्ध और यातनाओं से प्रभावित होने के कारण कानूनी तौरपर स्वीकार्य नहीं है।