यह धरती कभी तोड़ती नहीं, हमेशा जोड़ती रही है। एनसीईआरटी के इस कदम पर वह कहते हैं कि प्रयागराज के नागारिकों और प्रबुद्धजनों की जिम्मेदारी बनती है कि वह इसका खुलकर विरोध करें। निराला देश की सस्किृतिक चेतना के प्रतिनिधि हैं, इन्हें पाठ से बाहर करना उचित नहीं है। उनके प्रपौत्र विवेक कहते हैं कि निराला हमेशा प्रतिपक्ष की आवाज रहे हैं। निराला शाश्वत प्रतिपक्ष के कवि हैं। इसीलिए अपने समय की सत्ताओं ने उन्हें बर्दाश्त नहीं किया।
वह कहते हैं कि एक पीढ़ी पाठ्यपुस्तकों से तैयार होती है। निराला को पाठ्यक्रम से हटाकर नई पीढ़ी को उसकी विरासत से बेदखल किया जा रहा है। नई पीढ़ी को उसकी सांस्कृतिक चेतना के बोध से वंचित किया जा रहा है। ऐसे महान कवियों के साथ क्या सलूक होना चाहिए, यह हमे देखना चाहिए। विवेक कहते हैं कि एनसीईआरटी को अपने इस निर्णय को वापस लेना चाहिए। विवेक ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से आग्रह किया है कि वह इस मामले में हस्तक्षेप करें, ताकि निराला को पढ़ने से नई पीढ़ी वंचित न रह जाए।