नागवासुकि ने किया था समुद्र का मंथन
पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान नागवासुकि को रस्सी बनाकर देवताओं और दानवों ने समुद्र का मंथन किया था। समुद्र मंथन के बाद नागवासुकि काफी लहूलुहान हो गए थे। भगवान विष्णु की सलाह पर नागवासुकि ने संगमनगरी प्रयागराज में इसी स्थान पर आराम किया था।
इसके चलते इसे नागवासुकि मंदिर कहा जाता है। देश के कोने-कोने से श्रद्धालु सर्पदोष से मुक्ति पाने के लिए नागवासुकि महाराज का दर्शन करने और अनुष्ठान करने के लिए यहां पर आते हैं। यहां से कंकड़ ले जाकर घर में रखने पर घर पर कभी सांपों और नागों की छाया नहीं पड़ती है और सर्पदोष से मुक्ति मिलती है, ऐसी भी मान्यता है।