इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि प्रताड़ना के आरोप मात्र से आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला नहीं बनता। इसके लिए अपराध में आरोपी की सक्रिय भूमिका और आत्महत्या के लिए उकसाने से जुड़े ठोस आधार होने चाहिए। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की पीठ ने अमरोहा के दो आरोपियों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है।
बबलू उर्फ मोहम्मद काशिफ और एक अन्य ने कोर्ट में याचिका दायर की थी। दोनों आरोपियों पर आत्महत्या के लिए उकसाने समेत अन्य आरोपों में एफआईआर दर्ज की गई थी।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि आरोपियों की प्रताड़ना से परेशान होकर उसके बेटे ने आत्महत्या कर ली। पुलिस ने जांच के बाद आरोपपत्र दाखिल किया था। मामले में अमरोहा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने संज्ञान लिया। इसके बाद याचियों ने हाईकोर्ट में आरोपपत्र और संज्ञान आदेश को चुनौती दी। तर्क दिया कि जांच में आत्महत्या के लिए उकसाने या अन्य आरोपों को साबित करने वाला कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिला है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में आरोपी की मंशा और सक्रिय भूमिका महत्वपूर्ण है। आरोपी के कृत्य और आत्महत्या की घटना के बीच निकट संबंध होना भी जरूरी है। केवल प्रताड़ना या गुस्से में कही गई बात को अपने आप आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता।
अदालत ने सुसाइड नोट का परीक्षण करने के बाद पाया कि मुख्य आरोप, सह-आरोपी फैजल के खिलाफ था जबकि याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध सामान्य आरोप लगाए गए थे।