बढ़ते आतंकवाद और घटते प्राकृतिक संसाधनों के दौर में जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर का संदेश ‘जियो और जीने दो’ प्रासंगिक है। वैश्विक संदर्भों में उनके सिद्धांत मानवता और पर्यावरण के लिए जरूरी हैं। अपने साहस के बलबूते पर वह वर्धमान से महावीर के नाम से जाने गए। उन्होंने जहां जैन धर्म के सिद्धांतों को सुव्यवस्थित किया, वहीं पर्यावरण को बचाने के लिए संपूर्ण जगत को अहिंसा का महामंत्र दिया। बाह्य आडंबरों के परित्याग को ईश्वर उपासना और आत्मा की मुक्ति का मार्ग बताया।
ऋषभदेव से आरंभ हुए जैन धर्म में उनसे पहले 23 तीर्थंकर हुए पर महावीर ने अपनी अलग ही छाप छोड़ी है। 599 ईसा पूर्व बिहार के वैशाली स्थित कुंड ग्राम में राजवंश में जन्मे महावीर 30 साल की आयु में गृहस्थ धर्म को त्याग संन्यासी बने। 13 वर्ष के कठोर तप के बाद कैवल्य प्राप्त कर जिन कहलाए और 30 सालों तक जैन धर्म का प्रचार-प्रसार किया। जैन ग्रंथों के मुताबिक उन्होंने 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ द्वारा प्रतिपादित चार महाव्रत (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह) में संशोधन कर ब्रह्मचर्य को अलग स्थान दिया। वहीं जैन साधुओं को श्वेत वस्त्र धारण करने के बजाए नग्न रहने का आदेश दिया।
उन्होंने किए गए पापों को स्वीकार करने का नियम बनाया। आर्यिका गरिमामती उनके वर्धमान से महावीर बनने के प्रसंग के बारे में कहती हैं कि हिंसा से भरे वातावरण में सबके जीने की बात कहना बड़े साहस का काम था। जैन ग्रंथों में उनके वीर, अतिवीर, सन्मति और महावीर नाम का उल्लेख है। इस बारे में कथा है कि बाल्यावस्था में जब वह मित्रों के साथ खेल रहे थे तब देवराज इंद्र ने नाग के रूप में वहां आ गए। सभी बच्चे डर कर भाग गए, परंतु वर्धमान ने नाग के फन पर चढ़कर क्रीड़ा की। तब इंद्र ने उन्हें महावीर कहकर संबोधित किया। जैन महिला मंडल की मंत्री बाला जैन कहती हैं कि ‘अहिंसा परमो धर्म:’ और ‘जियो और जीने दो’ मंत्र की बदौलत जैन धर्म के लोगों का ही नहीं वरन संपूर्ण जगत का कल्याण संभव है। बताया महावीर अपने जीवन काल में कई बार कौशाम्बी आए।