यहां हम बात कर रहे हैं उदासी परंपरा के सबसे बड़े श्री पंचायती बड़ा उदासीन अखाड़े की। इसकी स्थापना वर्ष 1825 में बसंत पंचमी के दिन हरिद्वार में हर की पैड़ी पर की गई थी। मुगल बादशाह जहांगीर ने सात सौ बीघे जमीन इसके संतों को दान में दी थी।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा/नारद सारद सहित अहीसा...यानी कठिन तप से गुजरने वाले सनकादिक मुनि उनके देवता हैं और श्रीचंद्रदेव प्रथम गुरु। यहां हम बात कर रहे हैं उदासी परंपरा के सबसे बड़े श्री पंचायती बड़ा उदासीन अखाड़े की। इसकी स्थापना वर्ष 1825 में बसंत पंचमी के दिन हरिद्वार में हर की पैड़ी पर की गई थी। मुगल बादशाह जहांगीर ने सात सौ बीघे जमीन इसके संतों को दान में दी थी।
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इस अखाड़े में तपस्वी संतों की संख्या एक लाख से अधिक बताई जाती है। अविनाश मुनि अखाड़े के 164वें आचार्य हैं। अखाड़े के मुखिया श्रीमहंत दुर्गा दास बताते हैं कि 15वीं शताब्दी का दौर सांस्कृतिक अस्थिरता का था। सनातन धर्म पर हमलों के उस दौर में लाहौर की खड़गपुर तहसील के तलवंडी में सिख धर्म के प्रवर्तक गुरु नानक देव की पत्नी सुलक्षणा ने श्रीचंद्रदेव नामक बालक को जन्म दिया। श्रीचंद्रदेव ने ही बड़े होकर सनातन धर्म की रक्षा के लिए उदासीन संप्रदाय की स्थापना की। यही संप्रदाय 18वीं शताब्दी में अखाड़े में परिवर्तित हो गया। श्रीचंद्रदेव ने कश्मीर, पेशावर, काबुल से लेकर काशी तक तमाम यात्राएं कीं।
शिला पर बैठकर रावी नदी पार हुए थे श्रीचंद्रदेव
श्रीमहंत दुर्गा दास बताते हैं कि उदासीन आचार्य श्रीचंद्रदेव शिला पर बैठकर रावी नदी पार हुए थे। इसके बाद चंबा नामक जंगल में उनके हमेशा के लिए अंतरध्यान होने की बात कही जाती है। अखाड़े के गुरु और देवता पेशवाई (छावनी प्रवेश) और शाही स्नान (राजसी स्नान) के दौरान सांकेतिक रूप से सबसे आगे चलते हैं।