महीयसी महादेवी वर्मा जितनी महान लेखिका थीं, उतनी ही अच्छी मेजबान और पाक कला में माहिर भी थीं। होलिका दहन से लेकर दो दिनों तक उनके घर में साहित्य कुंभ होता और वह हर किसी का दिल खोलकर स्वागत करती थीं। अपने हाथों से बनाए पापड़ और गुझिया वह सबके पास जाकर खिलाती थीं। छोटा हो या बड़ा सभी के अभिभावक के रूप में वह राई और नमक से उनकी नजर उतार कर टीका करने में कभी नहीं चूकतीं।
महादेवी के घर होने वाले साहित्यिक कुंभ में रामकुमार वर्मा, लक्ष्मीकांत वर्मा, गोपी कृष्ण गोपेश, उमाकांत मालवीय, कैलाश गौतम, शेखर जोशी, अमृत राय, सुधा चौहान जैसी हस्तियां शामिल होती थीं। जहां सभी साथ मिलकर विशेष रूप से तैयार की गई ठंडई पीते और हंसी ठहाके लगाते थे।
स्मृतियां साझा करते हुए वरिष्ठ कवि यश मालवीय ने कहा, महादेवी जी अपने बगीचे के ताल में टेसू के फूल भिगो देती थीं जिससे सभी होली खेलते थे। परंपरा के साथ आधुनिकता का स्पर्श भी होता था। विधि विधान के साथ ही होलिका दहन होता था तो वहीं उस समय के फिल्मी गीत भी बजते थे। सभी के बीच बैठे हुए वह निराला और भारती के साथ खेली गई होली को भी याद करती थीं। हरिवंश राय बच्चन का घर करीब ही था और वह भी घूमते टहलते यहां पहुंचते थे। उस वक्त के माहौल को देखकर अहसास होता था कि साहित्य मस्ती के रंग में सराबोर है। महादेवी कहती थीं, त्योहार हममें स्फूर्ति और ऊर्जा का संचार करते हैं। जिंदगी में उत्साह, खुशियां बिखेरते हैं और रिश्तों की गर्माहट को बरकरार रखते हैं।