इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी आरोपपत्र पर संज्ञान लेने के चरण में मजिस्ट्रेट साक्ष्यों की गहन समीक्षा या उनकी सत्यता की जांच नहीं कर सकते। साथ ही मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) कन्नौज के उस आदेश पर रोक लगा दी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी आरोपपत्र पर संज्ञान लेने के चरण में मजिस्ट्रेट साक्ष्यों की गहन समीक्षा या उनकी सत्यता की जांच नहीं कर सकते। साथ ही मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) कन्नौज के उस आदेश पर रोक लगा दी जिसमें सपा के पूर्व नेता नवाब सिंह यादव व अन्य के खिलाफ पुलिस की चार्जशीट पर संज्ञान लेने से इन्कार कर दिया गया था। यह आदेश न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने राज्य सरकार की पुनरीक्षण याचिका पर दिया। नवाब सिंह यादव व अन्य के खिलाफ इटावा के कोतवाली थाने में आपराधिक षडयंत्र और धमकी समेत गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज है।
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आरोप है कि एक पॉक्सो मामले की सुनवाई के दौरान सत्र न्यायालय में गवाही देने पहुंचीं गवाह डॉ.स्वास्तिका शालिनी को धमकाया गया और आरोपी के पक्ष में बयान देने के लिए दबाव बनाया गया। शासकीय अधिवक्ता ने दलील दी कि मजिस्ट्रेट ने 31 पृष्ठों का विस्तृत आदेश पारित करते हुए साक्ष्यों का ऐसा मूल्यांकन किया, मानो मुकदमे का परीक्षण (मिनी ट्रायल) किया जा रहा हो। जबकि संज्ञान के स्तर पर अदालत को केवल यह देखना होता है कि प्रथमदृष्टया मामला बनता है या नहीं। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कमल शिवाजी पोकरनेकर बनाम महाराष्ट्र राज्य, रश्मि कुमार बनाम महेश कुमार भाड़ा और भगवंत सिंह बनाम पुलिस आयुक्त के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट को संज्ञान के चरण पर साक्ष्यों की सत्यता परखने का अधिकार नहीं है।