वतन पर मरने वालों का बाकी यहीं निशां होगा... हर बरस स्वतंत्रता दिवस पर दोहराई जाने वाली इन पंक्तियों का शहर के कई मोहल्ले और सड़कों के अंग्रेजी नाम आज भी मखौल उड़ाते दिख रहे हैं। हमारी बेबसी ऐसी कि आजादी के सत्तर साल बाद भी हम इन गुलामी के प्रतीकों को सम्मान सहित ढो रहे हैं। जॉनसनगंज, मम्फोर्डगंज, जार्जटाउन, लूकरगंज, थार्नहिल रोड, एल्गिन रोड, हीवेट रोड, स्टेनली रोड, मेयो रोड, मेयो हाल, लाउदर रोड, मिंटो रोड, आकलैंड रोड जैसे अंग्रेजी नाम बदस्तूर चलन में हैं।
शहर की कुछ सड़कों, मोहल्लों या स्मारकों के नाम बदले जरूर पर लोगों की जुबान पर कम ही आते हैं। सही बात तो ये है कि हमने गुलामी के इन तमाम प्रतीक चिन्हों को बदलने के लिए शिद्दत से पहल ही नहीं की। बदलाव के जो प्रस्ताव नगर निगम सदन के पटल पर रखे गए, उनमें भी अब तक कुछ पर अमल नहीं हुआ। सही मायने में बदलाव की जरूरत तो हमारी मानसिकता में है...
वर्ष 1906 में मौजूदा लूकरगंज मोहल्ले के नवनिर्माण की शुरुआत हुई। इसका श्रेय संयुक्त प्रांत के तत्कालीन लेफ्टीनेंट गवर्नर जेम्स डिग्स लाटूश को जाता है। पहले उन्हीं के नाम से इस मोहल्ले का नाम रखा जाना था, लेकिन उनकी पहल पर गवर्नमेंट प्रेस के तत्कालीन सुपरिटेंडेंट मिस्टर एफ लूकर के नाम पर इस मोहल्ले का नाम लूकरगंज रखा गया।
उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में इलाहाबाद इंप्रूवमेंट ट्रस्ट की ओर से नई बस्तियों का निर्माण कराया गया। मुट्ठीगंज और कीडगंज इलाहाबाद के पुराने मोहल्लों में शामिल हैं। इलाहाबाद के तत्कालीन कलेक्टर मिस्टर आर अहमुटी के नाम से मुट्ठीगंज और जनरल कीड के नाम से कीडगंज का नामकरण हुआ। सर जार्ज एलन के नाम से एलनगंज और मिस्टर मम्फोर्ड के नाम पर मम्फोर्डगंज बसा। वर्ष 1909 में जार्जटाउन बसा और वर्ष 1911 में हीवेट रोड बनी।
चंद्रशेखर आजाद पार्क के दक्षिण कोने में समदाबाद नाम से मेवातियों जबकि मौजूदा मेडिकल कॉलेज के निकट छीतपुर नाम का दूसरा गांव था। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान दोनों गांवों का सफाया करके अंग्रेजों ने इस विस्तृत क्षेत्र को सजा-संवार कर कंपनी के नाम से कंपनी बाग बसा दिया।
इलाहाबाद के तत्कालीन कमिश्नर मिस्टर थार्नहिल के नाम से थार्नहिल रोड नाम पड़ा। उन्हीं के प्रयास से वर्तमान सिविल लाइंस का सर्वेक्षण हुआ । सिविल लाइंस का पुराना नाम कैनिंगटाउन था और यहां के थाना, कैनिंगटन थाना हुआ। तत्कालीन कलेक्टर मिस्टर विलियम जॉनसन के नाम पर जान्सटनगंज बना। जॉनसन ने 1864 में चौक की पुरानी बस्ती एवं बियावान भूमि की जगह नया बाजार एवं पक्की सड़क बनवाई, जिसे उन्हीं की याद में आज जॉनसनगंज के नाम पर जाना जाता है। सर विलियम म्योर की याद में म्योर सेंट्रल कॉलेज का नाम रखा गया। 1891 में कॉल्विन डिस्पेंसरी बनी, जिसे अब मोतीलाल नेहरू अस्पताल के नाम से जाना जाता है।