इन्हीं भजनों को वैष्णव अखाड़ों एवं साधु-संतों को जाकर सुनाती हैं। इसमें मिले न्यौछावर से उनका जीवन यापन होता है। उनका कहना है एक बार सखी संप्रदाय में दीक्षित होने के बाद पूरे जीवन पालन करना होता है। इसके बाद कोई घर बार नहीं होता। अर्धकुंभ और कुंभ में ही देश भर से सखी संप्रदाय का जुटान गंगा किनारे होता है। यह उनके लिए नैहर सरीखा है। महीने भर यहां रहकर दूल्हा सरकार को रिझाने को नाचती गाती हैं। साधु-संतों की त्रिजटा स्नान के बाद विदाई के साथ इन्होंने भी अपने डेरा उखाड़ लिए। सभी अब अपने-अपने स्थानों को लौट जाएंगी। जाते समय मां गंगा से आशीष लिया और दूल्हा सरकार का भजन गाते हुए विदाई ली।
रामानंदी एवं कृष्णानंदी मेंं बंटी है सखियां
बैरागियों के सभी संप्रदाय में सखियों को मान्यता दी गई है। खास तौर से राधा बल्लभी निर्मोही अखाड़े में इनकी संख्या अधिक है। खास तौर से रामानंदी एवं कृष्णानंदी में विभाजित हैं। कृष्णानंदी शाखा की सखियां इसी भाव से कृष्ण की उपासना करती हैं। माथे पर तिलक लगाने के तरीके से इनका संप्रदाय पता चलता है। रामानंदी संप्रदाय की सखियां लाल तिलक लगाती हैं जबकि कृष्णानंदी शाखा की सखियां माथे राधा नाम की बिंदी लगाती हैं।
भक्ति भाव में आकर यह सखी का रूप रखते हैं जबकि शारीरिक रूप से पुरुष होते हैं। इनकी भी दो शाखाएं हैं। इनको कंठी माला के साथ मंत्र की दीक्षा दी जाती है। अयोध्या, मथुरा समेत अन्य अलग-अलग बैठकों में इनका प्रभाव है। - श्रीमहंत माधव दास मौनी बाबा, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष दिगंबर अनी अखाड़ा