इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की गई। याची के अधिवक्ता ने कहा,पोस्टमार्टम रिपोर्ट और विसरा रिपोर्ट में मृतक को जहर देने की बात सामने नहीं आई है। साथ ही अन्य कई तथ्य रखे। वहीं, शासकीय अधिवक्ता ने कहा, भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के अनुसार सुबूत का भार आरोपी व्यक्ति पर था कि वह यह बताए कि उनके घर में रहते हुए सुधा की मृत्यु कैसे हुई। इसके साथ ही अन्य कई तर्क दिए। कोर्ट ने दलीलों को सुनने के बाद याची अखिलेश कुमार मिश्रा की आजीवन कारावास की सजा को 10 वर्ष के कठोर कारावास में बदल दिया। वहीं, आरोपी जगदानंद झा और श्रीमती मीरा झा को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।