रीवा के देवतालाब से अच्छी कमाई का सपना संजोकर यहां परिवार के साथ आए दिव्यांग महावीर रोजगार की मंदी से घबराए हैं। बताया कि सेठ से दस हजार रुपये सूद पर लिए। ठौर न मिलने से दो से तीन सौ की बिक्री खुराकी पर खर्च हो जा रही है। वह चल नहीं सकते तो बेटी खुशबू सहारा बनी है। वहीं चौक से खिलौने आदि खरीद कर लाती है, लेकिन हालात से परेशान है।
दिव्यांग महावीर ने बताया कि शौचालय के पीछे तीन बच्चों और पत्नी के साथ रात में रहते हैं, लेकिन वहां से भी हटा दिया जाता है। हनुमना रीवा के उमेश रामदाना, पट्टी, मूंगफली पाग बेचने कुंभ में आए हैं। किराए पर ठेला लिया ब्याज पर रुपये लिए अब ठिकाना न मिलने से बिक्री दो से तीन सौ पर सिमटी है। रात में परेड में लगे झूलों के सामने कुछ बिक्री से दम बंधा है। वहीं खुल्दाबाद के राजा और उसकी बहन चार पहिए ठेले पर कॉस्मेटिक का सामान बेचते हैं। बताते हैं कि यहां घर न होता तो भूखे रह जाते। बिक्री नाम मात्र की है, फजीहत ज्यादा।
मऊ से हॉट डॉग (बर्गर) बेचने आए राजा ने बताया कि उन्हें दिहाड़ी के 300 रुपये रोज मिलते हैं, बिक्री हो या न हो, गुप्ता जी जानें। गुप्ता जी तीन भट्ठी वाले ठेले लेकर आए लेकिन अभी तक तीनों से कुछ खास बिक्री की रकम नहीं मिली। तीन ठेलों की बिक्री 2000 के आसपास है। खर्च काटकर मालिक के हाथ नाममात्र की रकम हाथ आ रही है। तीर्थ क्षेत्र में सर्वाधिक दर्द बड़ी रकम लगाकर श्रद्धालुओं को गंगा जल ले जाने के लिए प्लास्टिक के केन(डिब्बे) बेचने वाले कम बिक्री से घबराए हैं। करोड़ों की भीड़ में डिब्बों की बिक्री सैकड़ा पार नहीं कर पा रही है। भीड़ के बीच हर आधे घंटे में पुलिस का डंडा चलाना सीजनल कारोबार पर भारी पड़ रहा है। ऐसे लोगों की संख्या सैकड़ों में हैं, लेकिन दर्द सबका एक जैसा है।
मेंहदौरी गांव की सुधा संगम नोज को जाने वाले रास्ते पर फोल्डिंग चारपाई पर तरह-तरह के केन सजाए हैं। चार ग्राहक भी खड़े मिले, लेकिन सभी दस रुपये वाला छोटा डिब्बा ही खरीदने को मोलभाव करते दिखे। सुधा के मुताबिक 80 हजार की लागत लगाई है, अभी तक 28 हजार रुपये ही बिक्री से आए हैं। बिक्री का हाल यह है कि नारंगी रंग का पांच लीटर का डिब्बा लागत निकालने के लिए 50 रुपये का खरीद कर उतने में बेचा जा रहा है। बार-बार जबरन हटाए जाने और पुलिस की पिटाई से सभी परेशान हैं।
बच्चों का दिनभर करतब दिखाना नहीं भर पा रहा पेट
बिलासपुर और रीवा से आए दो परिवार छोटे-छोटे बच्चों के करतब दिखाकर भी उनका पेट नहीं भर पा रहे हैं। साइकिल पर टंगे स्पीकर पर बज रहे फिल्मी गानों के बीच सात वर्षीय बच्ची का रस्सी पर चलना, लोहे के रिंग से शरीर को निकालना आदि करतब हम सर्कस में ही देख पाते हैं, लेकिन मेले में मुफ्त करतब देखने वाले दस-बीस के नोट नहीं जेब से दो और पांच रुपये के सिक्के ही निकालकर थाली में डालते हैं। करतब देखकर नोट डालने वाले बिरले ही होते हैं। दिन में तीन से चार बार कठिन परिश्रम से करतब दिखाने वाले बच्चों और उनके परिवार को बामुश्किल एक बार में सौ या सवा सौ रुपये मिलते हैं।