दिव्य प्रेम सेवा के प्रख्यात कथावाचक आचार्य शान्तनु जी महाराज ने रघुवंश की माताओं का चरित्र सुनाते हुए मां कौशल्या, सुमित्रा, मां जानकी एवं उर्मिला जी के चरित्र का मार्मिक वर्णन किया और कहां यह देश यह धर्म संस्कृति यदि सुरक्षित है इन्हीं माताओं और बहनों के कारण जिन्होंने अपने पुत्रों को अपने भाइयों को अपने बेटों को तिलक लगाकर धर्म की रक्षा के लिए भेज दिया।
आचार्य शान्तनु
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सेक्टर 15 में स्थित दिव्य सेवा प्रेम मिशन के तत्वाधान मे चल रही कथा के दौरान उन्होने कथा मेंं बताया कि जब भगवान मां जानकी लक्ष्मण जी के साथ उनके लिए निकले पूरी अयोध्या मां कैकेई को धिक्कार देते हुए साथ चल पड़े यही तो अयोध्या वासियों का भगवान के प्रति प्रेम और समर्पण है ।
आचार्य शान्तनु
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केवट प्रसंग को सुनाते हुए कहा यदि परमात्मा से मिलन करना हो एकदम सरल सहज और भोले हो जाइए भोले भक्ति को परमात्मा बहुत पसंद करता है केवट भगवान से चरण धुलवा कर पार उतारने की बात करता है यही तो भक्त और भगवान के बीच का संबंध है केवट भगवान से अनेक तर्क करता है कि प्रभु मैं आपसे रोना इसलिए रोपा रहा हूं क्योंकि आप दयालु भक्तों के रुदन बर्दाश्त नहीं कर पाते।
आचार्य शान्तनु
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इसलिए महाराज श्री ने बताया रूदन ही वह भक्ति मार्ग की साधना है जो भगवत मिलन करा देती है केवट की नाव से भगवान ने गंगा पार की और केवट को उतर आए देना चाहा लेकिन केवट ने मना कर दिया कि मैं बचने से विमुख नहीं हो सकता और भेज देना ही चाहते हो लौट कर जब आओगे तब भगवान तब दे देना जो दोगे हम ले लेंग केवल भगवान को गंगा पार करता है बहुत देना चाहते हैं लेकिन केवट ने कुछ नहीं लिया और जो भगवान से कभी नहीं लेता भगवान उसके ऋणी हो जाते हैं।