इलाहाबाद विवि में आयोजित कवि सम्मेलन में रचना प्रस्तुत करते कवि कुमार विश्वास।
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कई और कवियों ने भी पढ़ीं रचनाएं
कुमार विश्वास के अलावा कई अन्य कवियों ने भी अपनी कविताएं पढ़ीं। इटावा से आए कवि राजीव राज ने पंक्तियां पढ़ीं, ‘दीप चाहत की समाधि पर जलाने आया, दर्द के गांव में रोतों को हंसाने आया, इससे पहले कि मेरी सांस की वीणा टूटे, जिंदगी आ तुझे मैं गीत बनाने आया, सिर्फ एक फूल के मानिंद के जिंदगानी है, चार-छह रोज से ज्यादा कहानी नहीं है, गीत मकरंद है महकेंगे हमेशा यारों, साज की पाखुरी सूख कर झर जानी है।’
हास्य-व्यंग के कवि सुदीप भोला ने अपनी पंक्तियों से श्रोताओं को भावुक कर दिया। बेटियों के दर्द पर आधारित कविता सुनाई, ‘गौरया ने अब बागों में आना छोड़ दिया, कोयलिया ने भी दहशत में गाना छोड़ दिया है, वहशी बनकर घूम रहे हैं आज चमन में भंवरे, डरके मारे कलियों ने मुसकाना छोड़ दिया है।’
बड़ी संख्या में लोगों ने लिया हिस्सा
आगे पंक्तियां पढ़ीं, ‘मीराबाई ने सुनकर एक तारा तोड़ दिया है, बांसुरिया ने भी सांसों से रिश्ता तोड़ लिया है। तनहाई में फफक रही बिसमिल्ला की शहनाई, बिटिया को पैजनियां मां ने डरकर नहीं दिलाई, टूट गए विश्वास डराती अपनों की परछाई, जो जन्मी नहीं अब तक वो बिटिया घबराई, कैसी बेहयाई आई, कैसी बेहयाई।’
कविता तिवारी ने पंक्तियां पढ़ीं, ‘सारी धरा तुम्हारे ही गीत गा रही है, लगा तू मधुरम वीणा बजा रही है, आ जाओ मंच पर भी आसन यहीं लगा लो, देवी सरस्वती मां तुम्हें बुला रही है।’ वहीं, राजनीति पर कटाक्ष करते हुए गजेंद्र प्रियांशु ने सुनाया, इतने निर्मोही कैसे सजन हो गए, किसकी बाहों में जाकर मगन हो गए, लौटकर के न फिर आए परदेस से, आदमी न हुए कालाधन हो गए।
आगे पढ़ा, ‘ऋतु चली जाएगी फिर से आनी नहीं, यह जवानी रहेगी जवानी नही, सब्र की एक सीमा होती पिया, धैर्य की एक सीमा भी होती पिया, हर किसी का तो दिल आडवाणी नहीं।’ इससे पूर्व इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली, उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, कुलपति प्रो. संगीता श्रीवास्तव, पुराछात्र एसोसिएशन के सचिव डॉ. कुमार वीरेंद्र ने दीप प्रज्ज्वलित कर कवि सम्मेलन का उद्घाटन किया। मंच का संचालन कर रहे कवि श्लेष गौतम को सम्मानित किया गया।