मामले में भगवान श्रीकृष्ण विराजमान व कई अन्य लोगों ने सिविल जज सीनियर डिवीजन मथुरा के समक्ष 25 सितंबर 2020 को दावा दाखिल किया। कहा कि कटरा केशव देव कृष्ण जन्मभूमि की जमीन से निर्माण हटाकर कब्जा सौंपने तथा 1973 में कुछ पक्षों के बीच हुए समझौते व डिक्री को रद करने की मांग की। सिविल जज ने वाद पंजीकृत नहीं किया और कहा वादी संख्या तीन लगायत आठ मथुरा निवासी नहीं है।
प्रकीर्ण केस की ग्राह्यता पर सुनवाई की तारीख तय की। बाद में प्रकीर्ण वाद पोषणीय न मानते हुए खारिज कर दिया। कहा वाद सुना गया तो सामाजिक व न्यायिक व्यवस्था प्रभावित होगी। जिसके खिलाफ जिला जज के समक्ष भगवान श्रीकृष्ण विराजमान व अन्य की तरफ से अपील दाखिल की गई। जिस पर विपक्षियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया।
याची विपक्षियों ने आपत्ति की कि सिविल जज का आदेश सीपीसी के आदेश सात नियम 11 में पारित नहीं है। इसलिए इसके खिलाफ अपील नहीं की जा सकती। जिला जज ने आपत्ति स्वीकार करते हुए अपील को पुनरीक्षण अर्जी में तब्दील कर दिया। कई वाद विंदु बनाए गए और अंतत: सिविल जज का आदेश रद कर पक्षों को सुनकर आदेश पारित करने का निर्देश दिया। जिस पर सिविल जज ने वाद पंजीकृत कर सम्मन जारी किया। इन्हीं आदेशों को हाईकोर्ट में याचिका में चुनौती दी गई थी।
याची की तरफ से हाईकोर्ट में आपत्ति की गई कि जमीन की मालियत 42 लाख, 26 हजार 230.40 रुपये है। जिला जज 25 लाख कीमत के वाद की पुनरीक्षण सुन सकते हैं। जिला जज को सुनवाई का अधिकार नहीं था। हाईकोर्ट में पुनरीक्षण दाखिल की जानी चाहिए थी। मंदिर की तरफ से कहा गया कि वाद में जमीन की कीमत 20 लाख है। याची को 42 लाख कीमत कहां से पता चली स्पष्ट नहीं है। इसलिए जिला जज का आदेश सही है। सिविल वाद की सुनवाई होनी चाहिए। सुनवाई पर लगी रोक हटाई जाय। कोर्ट ने दोनो पक्षों को सुनकर फैसला सुरक्षित कर लिया था और फैसला सुनाते हुए सिविल वाद की सुनवाई करने का आदेश दिया है।