फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कृष्ण जन्मभूमि मामला : मथुरा सिविल कोर्ट को भेजा गया शाही ईदगाह कृष्ण जन्मभूमि विवाद केस

Mon, 01 May 2023 08:43 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शाही मस्जिद ईदगाह ट्रस्ट, उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की याचिका पर हस्तक्षेप न करते हुए सिविल कोर्ट मथुरा को विचाराधीन वाद तय करने का निर्देश दिया है।
विज्ञापन
इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शाही मस्जिद ईदगाह ट्रस्ट, उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की याचिका पर हस्तक्षेप न करते हुए सिविल कोर्ट मथुरा को विचाराधीन वाद तय करने का निर्देश दिया है। कहा, सिविल कोर्ट मथुरा ने सिविल कटरा केशव देव की 13.37 एकड़ जमीन, जो कृष्ण जन्मभूमि है, को भगवान श्री कृष्ण विराजमान के नाम करने, अवैध निर्माण हटाने व 20 जुलाई 1973 में हुए समझौते को रद्द करने की मांग में दाखिल वाद पंजीकृत न कर गलती की है।

विज्ञापन


प्रकीर्ण अर्जी दर्ज कर उसकी ग्राह्यता पर फैसला सुनाना कानून के खिलाफ है।हाईकोर्ट ने यह भी कहा जिला जज मथुरा ने सिविल जज के फैसले के खिलाफ अपील को पुनरीक्षण में तब्दील कर कोई ग़लती नही की है। कोर्ट को ऐसा करने का कानूनी अधिकार है। कोर्ट ने कहा सिविल वाद की पोषणीयता विवाद सिविल कोर्ट ही तय कर सकती है। अब सिविल वाद पंजीकृत हो चुका है। विपक्षियों को लिखित कथन दाखिल करने के लिए सम्मन जारी हो चुका है।

अनुच्छेद 227 में इस मुद्दे को तय करने का हाईकोर्ट को अधिकार नहीं है और न ही जिला जज पुनरीक्षण में तय कर सकते थे। कोर्ट ने याचिकाओं को निस्तारित करते हुए प्रकरण सिविल कोर्ट को वापस भेज दिया है और पक्षों को अपना मुद्दा वहीं उठाने की छूट दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया ने सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड व ट्रस्ट शाही मस्जिद ईदगाह की प्रबंध समिति की याचिकाओं को निस्तारित करते हुए दिया है।

विज्ञापन

मामले में भगवान श्रीकृष्ण विराजमान व कई अन्य लोगों ने सिविल जज सीनियर डिवीजन मथुरा के समक्ष 25 सितंबर 2020 को दावा दाखिल किया। कहा कि कटरा केशव देव कृष्ण जन्मभूमि की जमीन से निर्माण हटाकर कब्जा सौंपने तथा 1973 में कुछ पक्षों के बीच हुए समझौते व डिक्री को रद करने की मांग की। सिविल जज ने वाद पंजीकृत नहीं किया और कहा वादी संख्या तीन लगायत आठ मथुरा निवासी नहीं है।

प्रकीर्ण केस की ग्राह्यता पर सुनवाई की तारीख तय की। बाद में प्रकीर्ण वाद पोषणीय न मानते हुए खारिज कर दिया। कहा वाद सुना गया तो सामाजिक व न्यायिक व्यवस्था प्रभावित होगी। जिसके खिलाफ जिला जज के समक्ष भगवान श्रीकृष्ण विराजमान व अन्य की तरफ से अपील दाखिल की गई। जिस पर विपक्षियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया।

विज्ञापन

याची विपक्षियों ने आपत्ति की कि सिविल जज का आदेश सीपीसी के आदेश सात नियम 11 में पारित नहीं है। इसलिए इसके खिलाफ अपील नहीं की जा सकती। जिला जज ने आपत्ति स्वीकार करते हुए अपील को पुनरीक्षण अर्जी में तब्दील कर दिया। कई वाद विंदु बनाए गए और अंतत: सिविल जज का आदेश रद कर पक्षों को सुनकर आदेश पारित करने का निर्देश दिया। जिस पर सिविल जज ने वाद पंजीकृत कर सम्मन जारी किया। इन्हीं आदेशों को हाईकोर्ट में याचिका में चुनौती दी गई थी।

याची की तरफ से हाईकोर्ट में आपत्ति की गई कि जमीन की मालियत 42 लाख, 26 हजार 230.40 रुपये है। जिला जज 25 लाख कीमत के वाद की पुनरीक्षण सुन सकते हैं। जिला जज को सुनवाई का अधिकार नहीं था। हाईकोर्ट में पुनरीक्षण दाखिल की जानी चाहिए थी। मंदिर की तरफ से कहा गया कि वाद में जमीन की कीमत 20 लाख है। याची को 42 लाख कीमत कहां से पता चली स्पष्ट नहीं है। इसलिए जिला जज का आदेश सही है। सिविल वाद की सुनवाई होनी चाहिए। सुनवाई पर लगी रोक हटाई जाय। कोर्ट ने दोनो पक्षों को सुनकर फैसला सुरक्षित कर लिया था और फैसला सुनाते हुए सिविल वाद की सुनवाई करने का आदेश दिया है।

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें