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कल से कल्पवासियों का जमावड़ा

Sun, 08 Jan 2017 01:46 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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माघ मेला
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महीने भर चलने वाला माघ मेला इस बार अव्यवस्थाओं के बीच चार दिन बाद 12 जनवरी से शुरू हो रहा है। पौष पूर्णिमा से कल्पवास का संकल्प लेने वाले श्रद्धालुओं का 9 जनवरी से जमावड़ा होगा। संतों तीर्थपुरोहितों के शिविर अभी अधूरे हैं। वे दिन-रात शिविर तैयार कराने में व्यस्त हैं। हालांकि मेले में अभी पूरी तरह से बुनियादी सुविधा बहाल नहीं हो पाई है। इससे कल्पवासियों को परेशानी का सामना करना पड़ेगा।
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माघ मेला में आस्था की नगरी बसाने आए खाक चौक, संगम लोअर, दंडीबाड़ा आचार्य बाड़ा काली सड़क गंगोली शिवाला, जीटी रोड त्रिवेणी रोड आदि क्षेत्रों में शिविर निर्माण करा रहे संतों और तीर्थपुरोहितों का कहना है कि प्रशासन की ओर से की जानी वाली तैयारियां अभी अधूरी हैं। भूमि आवंटन में देरी के कारण उनके शिविर भी अभी पूरे नहीं हो पाए हैं।
 महामंडलेश्वर कपिलदेव दास कहते हैं कि मुख्य सड़कों को छोड़कर पूरे मेले में अव्यवस्था है। स्नानघाट बनाने का काम भी धीमी गति से किया जा रहा है।

अखिल भारतीय तीर्थपुरोहित महासभा के महामंत्री मधु चकहा के मुताबिक पौष पूर्णिमा से मेला शुरू हो जाएगा। तीर्थपुरोहितों के यहां श्रद्धालुओं का आना सोमवार से आना शुरू हो जाएगा। अभी तक शिविर का काम पूरा नहीं हो पाया है। कहा, तीर्थपुरोहितों को गाटा रोड में बसाया जाता है। अभी तक गाटा रोडों पर चकर्ड प्लेट नहीं बिछाई गई है।
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 ज्योतिष, द्वारिकाशारदापीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के प्रतिनिधि शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के अनुसार माघ में किया गया एक माह का कल्पवास एक कल्प के बराबर अर्थात 4320000000 वर्षों तक किए गए पुण्य के बराबर होता है। कल्पवास के पुण्य से भगवान शिव ने त्रिपुर राक्षस का वध, भारद्वाज मुनि ने सप्तर्षि में स्थान पाया। कल्पवास से सनकादि ऋषियों को आत्मदर्शन, वैवस्वतमनु ने इष्ट सिद्धि प्राप्त की। कल्पवास करने से देव, पितर प्रसन्न होते हैं।  

आयुर्वेदाचार्य एस के राय के अनुसार  कल्पवास संपूर्ण कायाकल्प करने वाला है। इस दौरान  किए जाने वाले अनुशासन से मानसिक शारीरिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य संतुलित होता है। जिससे लोगों में जीवन के प्रति सार्थक द्रष्टिकोण पैदा होता है। शरीर में जमा अपक्व रस, व्रत सयंमी जीवन और गंगा की रेती में नंगे पैर चलने से पक्व हो शरीर से निकल जाता है। पेट में होने वाली बीमारियां, गठिया और अवसाद आदि नियंत्रित हो जाती है।

कल्पवास व्रत का संकल्प लेने के साथ ही कल्पवासियों का जप तप स्नान के साथ षटतिला का अनुशासन भी शुरू हो गया। इस दौरान तिल का प्रयोग किया जाएगा। तिलयुक्त जल से स्नान, तिल से तर्पण, तिल का दान से उबटन, तिल से हवन, यहां तक भोजन में तिल शामिल होगा। आचार्य विद्याकांत पांडेय के मुताबिक शिव मंदिर में तिल के तेल का दीपक जलाने का विशेष पुण्य है।
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