पूर्व में न्यायधीशों की नियुक्ति संबंधी कानून को बनाते समय भी विधायिका ने अप्रत्याशित एकता दिखाई थी और बगैर समुचित बहस किए एक ऐसे कानून को बनाया जो प्रत्यक्षत: न्यायपालिका की स्वायत्तता को आघात पहुंचा रहा था। विधायिका को यह पता होना चाहिए कि हमारे संविधान में शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत को स्वीकार करते हुए न्यायपालिका द्वारा विधायी निर्णयों की समीक्षा करने के प्रावधान किए गए हैं।
उन्होंने कहा है कि अनुच्छेद 13 न्यायिक समीक्षा के लिए एक संवैधानिक आधार प्रदान करता है, क्योंकि यह उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों को यह अधिकार देता है कि वे संविधान पूर्व कानूनों की व्याख्या करें। और यह तय करने का भी अधिकार देता है कि ऐसे कानून वर्तमान संविधान के मूल्यों और सिद्धांतों के साथ सुसंगत है या नहीं। अगर प्रावधान वर्तमान कानूनी ढांचे के साथ आंशिक या पूरी तरह से विरोधाभासी हैं तो उन्हें अप्रभावी समझा जाएगा जब तक कि उनमें संशोधन न किया जाए।
इसी प्रकार, संविधान लागू होने के बाद कानूनों को उनकी अनुकूलता को साबित करना होगा कि वे विरोध में नही हैं। अन्यथा उन्हें भी शून्य माना जाएगा। ऐसे में यह कहा जाना कि विधायिका द्वारा बनाए गए कानून की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती है, संविधान की मंशा ही नहीं बल्कि सांविधानिक प्रावधान के विरुद्ध है। उनका कहना है कि बेहतर होगा कि न्यायपालिका की संविधान प्रदत्त शक्तियों और स्वायत्तता पर चोट करने की जगह विधायिका अपनी शक्तियों का प्रयोग संविधान सम्मत कानून बनाने के लिए करें। जहां तक संविधान के मूल ढांचे के सिद्धांत को चुनौती देने की बात है तो यह समझ लिया जाना चाहिए कि पिछले पांच दशक में इसकी स्वीकार्यता ने संविधान और संवैधानिक मूल्यों को सशक्त ही किया है। ऐसे अनेक अवसर आए जब इसी सिद्धांत के आधार पर संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की गई है।