इसके करीब 32 साल बाद 28 अक्तूबर 2015 को याची रामविजय ने हाईकोर्ट में यह कहते अर्जी दाखिल की कि घटना के दिन उसकी उम्र 13 साल के करीब थी और वह नाबालिग था। उसकी अर्जी लंबित रही और हाईकोर्ट ने 22 अप्रैल 2020 को अपील खारिज करते हुए सेशन कोर्ट के निर्णय को सही करार दिया। हाईकोर्ट के निर्णय के खिलाफ याची ने सुप्रीमकोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल की। जिस पर सुप्रीमकोर्ट ने हाईकोर्ट को याची के आयु निर्धारण को लेकर दाखिल अर्जी पर सुनवाई कर निस्तारित करने का निर्देश दिया।
याची की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अनूप त्रिवेदी का कहना था कि रेडिया लॉजी रिपोर्ट के आधार पर इस अदालत ने आरोपी रामविजय को विचारण लंबित रहने के दौरान ही जमानत पर रिहा कर दिया था। 22 अक्तूबर 1982 को सेशन कोर्ट द्वारा सुनाए गए आदेश में रेडियोलॉजी रिपोर्ट रिकार्ड में नहीं है। इस रिपोर्ट को किसी ने चुनौती नहीं दी। इसलिए उसी रिपोर्ट को सही मानते हुए याची को नाबालिग घोषित किया जाए। कोर्ट ने किंगजार्ज मेडिकल विश्वविद्यालय लखनऊ को विशेषज्ञों की टीम बनाकर याची की आयु का निर्धारण करने का निर्देश दिया।